अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वरदान या अभिशाप !! – दि फिअरलेस इंडियन
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वरदान या अभिशाप !!

  • Amit Pradhan
  • April 5, 2017
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जैसा की उच्चतम न्यायलय के पहुचे हुए वकील प्रशांत भूषण ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी को ललकारते हुए कृष्णविरोधी दल बनाने की चुनौती दे डाली उसके बाद से देश में इस बात की बहस छिड़ना लाज़िमी था की आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस देश में अभिप्राय क्या है, क्या हमें इसके ऊपर बहस की आवश्यकता महसूस नहीं होती, आखिर क्यों कोई भी कुछ भी कह कर चला जाता है और हम उसे उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर माफ़ कर देते है, क्यों ये एक विशेष धर्म के प्रति ही होता है जिसे लोगो ने असहिष्णु घोषित कर रखा है

आइये अब देखते है की ऐसा करने वाले आखिर ऐसा करते क्यों है, बात करते है प्रशांत भूषण की इन्होंने इससे पहले भी ऐसे विवादित बयां दिए है, जैसे की सितम्बर २०११ में बनारस की एक प्रेस वार्ता के दौरान इनका बयान आया था की कश्मीर मुद्दे पर जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए और उसके आधार पर अगर कश्मीरी बंधू भारत के साथ ना रहना चाहे तो उन्हें कश्मीर दे कर अलग कर देना चाहिए, इनका ये रवैया २०१४ में एक टीवी चैनल को दिए साक्षत्कार के दौरान भी उजागर हुवा था और तब ये जनाब आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक थे, इस वक्तव्य के बाद इनके ऊपर एक आम नागरिक द्वारा हमला भी किया गया था और उस नागरिक को इनके ऊपर हमले का दोषी माना गया था

इसी प्रकार २९ – ३० जनवरी २०१५ को इन महापुरुष ने याकूब मेनन की फांसी रुकवाने के लिए रात में उच्चतम न्यायलय खुलवा लिया था, वो अलग बात है की वहां से उन्हें मुँह की खानी पड़ी और आखिरकार मुम्बई धमाको के मुजरिम याकूब मेनन को फांसी की सजा दी गई

उपरोक्त उदाहरणों से पता चलता है की ये सज्जन पुरुष कितने राष्ट्र भक्त है, और इन जैसे महापुरुषों की वजह से ही हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ता है

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