योग्यता रहने के बावजूद सरदार पटेल ने नहीं की वंश की राजनीती – दि फिअरलेस इंडियन
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योग्यता रहने के बावजूद सरदार पटेल ने नहीं की वंश की राजनीती

  • hindiadmin
  • August 28, 2017
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आज जबकि अपने वंश और परिजन को, योग्यता नहीं रहने के बावजूद, राजनीति में ऊंचे से ऊंचा पद दिलाने के लिए बड़े-बड़े नेताओं में होड़ मची हुई है, ऐसे समय में सरदार वल्लभ भाई पटेल अधिक याद आते हैं. सरदार साहब ने अपने जीवनकाल में अपनी संतान को न तो सांसद बनवाया और न ही कोई मंत्री. हालांकि उनके कुछ समकालीन नेताओं ने अपने वंश को आगे बढ़ाने का काम तभी से शुरू कर दिया था. पर सरदार तो कुछ अलग ढंग के नेता थे. आजादी के समय उनकी पुत्री मनीबेन और पुत्र दाह्या पटेल वयस्क और योग्य थे. उन्होंने आजादी की लड़ाई में जेल यातना भी भुगती थी. सरदार साहब के निधन के बाद वो जरूर सांसद बने. दाह्या भाई पटेल की गिनती तो देश के सर्वोत्तम सांसदों में होती है.

वंशवाद की राजनीति कर लोकतांत्रिक व्यवस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं-
सरदार पटेल के परिवार पर भ्रष्टाचार का भी कभी कोई आरोप नहीं लगा. लेकिन आज इस देश के कई बड़े नेता अपने अयोग्य परिजन को ऊंचे पदों पर बिठाकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.

सरदार वल्लभ भाई पटेल की दो संतानें थीं. दोनों देश सेवा और समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत थीं. वो योग्य पिता की योग्य संतानें थीं. उनको लेकर कभी कोई विवाद भी नहीं सुना गया. पर शब्द के सही अर्थों में गांधीवादी सरदार पटेल ने अपने जीवनकाल में इनमें से किसी को मंत्री, सांसद तक नहीं बनने दिया.

हां, सरदार की देखभाल के लिए उनकी पुत्री मनीबेन उनकी सेवा में साथ रहती थीं. निजी सहायक के रूप में काम करती थीं. १५ दिसंबर, १९५० को ७५ वर्ष की आयु में सरदार पटेल का निधन हो गया. सरदार के निधन के बाद उनकी पुत्री मनीबेन पटेल बंबई चली गईं. उन्होंने वहां सरदार पटेल ट्रस्ट और अन्य दंतव्य संस्थाओं के लिए काम किया. तब गुजरात भी बंबई राज्य का ही हिस्सा था.

सरदार पटेल के पास कांग्रेस का कोष रहता था. सरदार के निधन के फौरन बाद मनीबेन ने पैसों से भरे बक्से को जवाहर लाल नेहरू को ले जाकर दे दिया था. मनीबेन का जन्म ३ अप्रैल, १९०३ को हुआ था. मनीबेन १९१८ में १५ वर्ष की छोटी उम्र में ही महात्मा गांधी के प्रभाव में आ गई थीं. वह अहमदाबाद स्थित गांधी आश्रम में काम करने लगीं. उन्होंने असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया. वह १९४२ से १९४५ तक येरवडा जेल में रहीं.

अपनी डायरी लिखी जिसमें उन्होंने सच्ची बातें लिखी
मनीबेन १९३० में अपने पिता की निजी सहायक बन गई थीं. यह भूमिका उन्होंने १९५० में उनके निधन तक निभाई. इस दौरान मनीबेन ने अपनी डायरी लिखी. इसमें उन्होंने सच्ची बातें लिखीं, जो बाद में ‘इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदर पटेल: द डायरी ऑफ मनीबेन पटेल’ नाम से पुस्तक के रूप में छपी.

उस डायरी में साल १९३६ से १९५० तक का विवरण है. निजी सहायक के रूप में काम करते समय वह इस बात का ध्यान रखती थीं कि किसी के साथ अनावश्यक बात करते-करते सरदार साहब थक न जाएं. सरदार के पुत्र दाह्या भाई पटेल का जन्म २८ नवंबर, १९०५ को हुआ था.

दाह्या भाई ने गुजरात विद्यापीठ में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पाई. उन दिनों पूरे देश में विद्यापीठें थीं. वो स्वतंत्रता आंदोलन का ही हिस्सा मानी जाती थीं. तब स्वतंत्रता सेनानी अपनी संतानों को उन्हीं विद्यापीठों में शिक्षित करते थे. दाह्या भाई पटेल पहले ओरिएयंटल इंश्योरेंस कंपनी में काम करते थे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और राजनीति में शामिल हो गये.

साल १९४२ से १९४४ तक दाह्या भाई जेल में थे. १९५७ और १९६२ में वो लोकसभा के सदस्य बने. वह राज्यसभा में भी रहे. पहले वो कांग्रेस पार्टी में थे पर बाद में वो स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए. पूर्व गवर्नर जनरल राज गोपालाचारी ने १९६० में इस पार्टी की स्थापना की थी. १९६७ में लोकसभा में यह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी थी.

दाह्या भाई पटेल दक्षिण पूर्व एशिया की राजनीति के विशेषज्ञ माने जाते थे. लोग उन्हें उच्च कोटि के सांसद कहते थे. ११ अगस्त, १९७३ को उनके निधन के बाद राष्ट्रपति वी.वी.गिरी ने उन्हें देशभक्त और कुशल सासंद कहा था. यानी इतनी योग्यता रहते हुए भी सरदार पटेल की संतान संसद में तभी पहुंची जब सरदार पटेल इस दुनिया में नहीं रहे.

एक बार डॉ. नामवर सिंह ने मुझसे कहा कि वह अपने बेटे को गोद में लेकर दुलारने की इच्छा पूरी नहीं कर सके थे. ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय गांवों के संयुक्त परिवारों में ऐसी परंपरा नहीं होती थी कि कोई अपनी संतान को गोद में ले. वह दूसरे की संतान को गोद में लेगा और उसकी अपनी औलाद को परिवार का कोई दूसरा सदस्य खेलाएगा.

अनेक नेता मौजूद थे जो अपनी संतान को राजनीति में नहीं बढ़ाते थे
स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ी में ऐसे अनेक नेता मौजूद थे जो उसी परंपरा का पालन करते हुए अपनी संतान को राजनीति में नहीं बढ़ाते थे. हालांकि उनमें भी कई अपवाद थे. सरदार पटेल कुछ अलग ढंग के थे.

आज तो देश के अधिकतर नेताओं के सामने यही सबसे बड़ी चिंता होती है कि किस तरह वो अपनी संतान को अपनी जगह स्थापित कर दें. नेता की संतान का राजनीति में आना परिवारवाद नहीं है. बल्कि प्रधानमंत्री की संतान को सीधे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की संतान को सीधे मुख्यमंत्री बनवा देना वंशवाद है.

इससे त्याग-तपस्या और कर्तव्य के साथ लाइन में खड़े सैकड़ों राजनीतिक कार्यकर्ताओं-नेताओं का हक मारा जाता है.

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