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दिल्ली नगर निगम चुनावो का राजनितिक असर

  • Amit Pradhan
  • April 26, 2017
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आज दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणामो ने देश के राजनितिक दलों को आत्म विश्लेषण के लिए मजबूर कर दिया है, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के त्रिकोणीय मुकाबले को बीजेपी ने एकतरफा मुकाबला बना दिया, इस हार जीत का असर दिल्ली के साथ-साथ देश की राजनीती पर भी देखने को मिलेगा। भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली नगर निगम के चुनावों में अभूतपूर्व जीत हासिल की, विरोधी दलों को इस जीत के मायने को देखते हुए आत्मचिंतन की सख्त जरूरत पड़ेगी।

 

आइये नजर डालते है इस जीत और हार पर, दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी १० सालो से काबिज थी और ये चुनाव उसके लिए काफी अहम माने जा रहे थे, बीजेपी पार्षदों के ऊपर लगातार आरोप लग रहे थे, यहाँ पर लोग नगर निगम के काम से खुश नहीं थे, बावजूद इसके दिल्ली बीजेपी ने एक सोची समझी रणनीति के तहत अपने पुराने पार्षदों के टिकट काट दिए और नए चेहरों को मौका दिया, इसके अलावा उन्होंने आज देश के सबसे पसंदीदा नेता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे कर इस चुनावी समर की तैयारी की। जनता ने भी बीजेपी पर अपना भरोसा दिखाते हुए उन्हें अभूतपूर्व जीत से सम्मानित किया।

 

दूसरे नंबर पर रही आम आदमी पार्टी और उनके नेताओ के लिए भी दिल्ली नगर निगम चुनाव नाक का सवाल बना हुआ था और आखिर हो भी क्यों न जिस पार्टी ने अपनी शुरुआत ही दिल्ली से की हो और विधानसभा चुनावो में ७० में से ६७ सीटे जीत कर एक रिकॉर्ड कायम किया हो उसके लिए भी विधानसभा चुनावो के बाद खुद को साबित करने का मौका था की वो अभी चुके नहीं है, लेकिन दिल्ली की जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया।

 

तीसरे नंबर पर रही कांग्रेस पार्टी के लिए भी ये चिंतन का समय है, जिस पार्टी ने दिल्ली पर १५ साल राज किया हो उसका ऐसी हालत में पहुँचना उनके लिए सोचनीय विषय है, शायद कांग्रेस की अकेले चलो की निति यहाँ काम ना आई और दिल्ली प्रदेश प्रमुख श्री अजय माकन ने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी, अपने नेताओ को संतुष्ट ना रख पाना भी कांग्रेस के हार की बड़ी वजह बना, जैसे इनके नेता चुनावो से तीन दिन पहले बीजेपी में शामिल होते दिखे उसका असर जनता में गहरे तक गया।

 

अब समय आ गया है की सारे राजनितिक दलों को आत्म चिंतन करना चाहिए, आआपा की दिल्ली में हार की बड़ी वजह रही उनका दुसरो को कोसते रहना, विधाई संस्थाओ पर ऊँगली उठाना, खुद को सबसे पाक साफ़ साबित करने के चक्कर में दुसरो को नीचे दिखाना, अगर कभी किसी ने आइना दिखाने की कोशिश की तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देना, देश के प्रधानमंत्री तक का मज़ाक उड़ाना, जनता अब इस प्रकार के बहकावे से ऊब चुकी थी और दिल्ली नगर निगम में उसने बीजेपी के समर्थन से ज्यादा आआपा के विरोध में वोट किया।

 

इस हार के बाद कई दलों में फूट भी पड़ जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है, आआपा की शुरुआत तो उनके सांसद भगवंत मान के बयानों से हो चुकी है, जिसमे उन्होंने पंजाब और गोवा की हार का सारा ठीकरा पार्टी आला कमान पर फोड़ दिया, आजकल अरविन्द केजरीवाल के ख़ास रहे कुमार विश्वास के बोल भी बगावती तेवर वाले ही है और कोई बड़ी बात नहीं है कि ये नेता आआपा को छोड़कर किसी और का दामन थाम ले। आज मिली शर्मनाक हार के बाद भी आआपा का रवैया वही पुराना है और दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा कभी धरने की बाते सामने आ रही है तो कभी ईंट से ईंट बजाने की। पार्टी अपनी इस हार को स्वीकार कर के आत्ममंथन को तैयार नहीं दिख रही है जिसके की दूरगामी परिणाम उनके लिए बुरे ही होंगे, आज अरविन्द केजरीवाल के गुरु श्री अन्ना हज़ारे ने भी उन्हें सीख दे डाली और हार से सबक सीखने को कहा लेकिन अपनी ही जिद पर अड़े रहने वाले अरविन्द केजरीवाल के लिए शायद वो भी बर्दाश्त नहीं होगा।

 

कांग्रेस ने बिहार में एक सूत्र का इज़ाद किया और गैर भाजपा दलों के साथ मिल कर चुनाव लड़ा और वहाँ पर जीत हासिल की, आज राजद के नेता लालू प्रसाद यादव ने फिर से गैर बीजेपी दलों को आपस में मिल कर चुनाव लड़ने का आह्वान किया, कांग्रेस देश में अपनी जमीन लगातार खोती जा रही है और कई जगह पर तो वो क्षेत्रीय दलों से नीचे जा चुकी है।

 

दिल्ली नगर निगम देश के राजनितिक समीकरणों पर बहुत गहरा असर डालेंगे, और हमें नए नए राजनितिक समीकरणों से दो चार होना पड़ेगा, कई पार्टियों में टूट फूट, नए प्रकार के बेमेल गठबंधन और नेताओ की अनर्गल बयानबाजी को झेलने के लिए तैयार रहिये।

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