समाधानपूर्वक वादों के बाद भी इस तरह गुमराह किया जाता है किसानों को… – दि फिअरलेस इंडियन
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समाधानपूर्वक वादों के बाद भी इस तरह गुमराह किया जाता है किसानों को…

  • hindiadmin
  • March 16, 2018
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महाराष्ट्र में तकरीबन एक हफ्ते तक चला किसान आंदोलन सोमवार को खत्म हो गया. महाराष्ट्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच ‘किसानों की माँगों’ को लेकर समझौता हो गया है. किसानों ने 12 मार्च को विधानसभा का घेराव करने की घोषणा की थी. हजारों की संख्या में किसान मुंबई में इकट्ठा हुए थे. लेकिन, इससे पहले सोमवार को मुंबई के विधानभवन में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डणवीस की अध्यक्षता में महाराष्ट्र सरकार और किसानों के प्रतिनिधिमंडल के बीच एक बैठक हुई.

इस बैठक के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डणवीस ने कहा, “हमने किसानों की सभी माँगें मान ली हैं और उन्हें भरोसा दिलाने के लिए एक लिखित पत्र भी जारी किया है.”

लेकिन, ऐसा पहली बार नहीं है जब किसानों ने आंदोलन किया हो और सरकार ने उनसे कुछ वादे किये हों. फिर भी समय-समय पर अलग-अलग राज्यों के किसान अपनी समस्याएं उठाते रहते हैं. कुछ समय पहले ही दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया था.

अभी तक जितने भी आंदोलन हुए हैं वो सामयिक मुद्दे को लेकर होते हैं और उस मुद्दे का आधा—अधूरा हल लेकर समाप्त हो जाते हैं. कभी गन्ने के भुगतान को लेकर, कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिलने को लेकर विरोध होता है और सरकार उसमें थोड़ी बहुत राहत दे देती है.

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जैसे चुनाव या आंदोलन के समय कुछ कर्ज़ माफ़ी दे दी जाती है. लेकिन, किसान की समस्या का समग्र और स्थायी हल कोई सरकार नहीं ढूंढती है. बस तात्कालिक गुस्से को ठंडा करने के लिए आधे—अधूरे उपाय और राहतें दे दी जाती हैं.

ऐसा ही इस आंदोलन में भी हुआ होगा. यह बात सिर्फ़ महाराष्ट्र के किसानों की नहीं है, बल्कि पूरे देश के किसानों की समस्या है. सारी सरकारों का प्रयास अधूरे उपाय करने का होता है. सरकारी योजनाएं भी इसका समग्र समाधान नहीं होतीं. उन्हें शब्द जाल में उलझा दिया जाता है. यह मसले उठते रहते हैं और दबते रहते हैं. इसलिए यह क्षेत्रीय समस्या का आधा-अधूरा समाधान है.

जातियों में बंट जाते है किसान
किसी भी समस्या को लेकर हमारे देश में आर्थिक और मौलिक मुद्दों पर वोट देने की आदत नहीं है. ये समस्या सिर्फ़ किसान के साथ नहीं हर किसी के साथ है. इसका सबसे पहला फ़ायदा तात्कालिक और लुभावनी घोषणाएं करने वाले राजनेताओं को होता है और फिर पांच साल बाद मतदाता ठगा हुआ महसूस करता है.

उसे समझ नहीं आता कि उन्हें भावनात्मक और भड़काऊ मुद्दों के आधार पर जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि पर बांटकर वोट ले लिया जाता है. आधारभूत मुद्दों को पीछे कर दिया जाता है. जब तक मतदाता जिनमें किसान भी आता है, मुद्दों पर चिंतन करके उनके आधार पर वोट डालने का अभ्यास नहीं करेंगे तब तक ठगे जाते रहेंगे.

किसान संगठनों से क्या फ़ायदा?
आज के समय में किसान संगठनों की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है. एक किसान संगठन जिससे सहयोग लेकर कोई राजनीतिक दल सत्ता में आता है और फिर वही संगठन किसान को लेकर आंदोलन कराता है. इसका क्या मतलब है. किसानों को क्यों गुमराह कर रहे हैं?

ये लोग ढोंग और दिखावा करते हैं और उसके जरिए लोकसभा, विधानसभा की सीट या कोई और फ़ायदा पा लेते हैं.

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