फिल्मों में सेंसर बोर्ड का औचित्य और उपयोगिता – दि फिअरलेस इंडियन
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फिल्मों में सेंसर बोर्ड का औचित्य और उपयोगिता

  • Amit Pradhan
  • April 17, 2017
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आज हमारी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवी अभिनेता श्री अमोल पालेकर जी ने उच्चतम न्यायलय में एक याचिका दाखिल कर संवेदक मंडल (सेंसर बोर्ड) को नियमो में नरमी बरतने की अपील की है, आइये कोशिश करते है जानने की, कि आखिर ऐसी जरुरत क्यों आन पड़ी कि इतने अनुभवी अभिनेता को इस प्रकार कि याचिका दाखिल करनी पड़ गई?

 

हालांकि भारत में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र १९१३ में बनाई गई, लेकिन भारतीय सिनेमेटोग्राफ अधिनियम १९२० में लागू किया गया, उस समय ये मद्रास, बॉम्बे (अब मुंबई), कलकत्ता (अब कोलकता), लाहौर और रंगून के पुलिस के मुखिया अंतर्गत आता था, उस समय हमारे देश में अंग्रेजो का साशन था और इसलिए इस अधिनियम कि आवश्यकता महसूस हुई, आज़ादी के बाद सारे क्षेत्रीय सम्वेदको को बंद कर के एक संवेदक मंडल का प्रादुर्भाव १९५२ में हुआ, उसके बाद पुनः १९८३ में मंडल का पुनर्गठन नए नियमो के साथ किया गया जो कि आज हमारे सामने है।

 

पुराने समय कि संस्कृति और लोगो कि मीडिया तक पहुंच को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के मंडल का गठन सर्वथा उचित था, लेकिन आज हमारा संवेदक मंडल जिसमे के एक अध्यक्ष के अलावा २५ और मेंबर होते है उनका काम है फिल्मो को उनके अनुसार प्रमाणपत्र देना, ये प्रमाण पत्र ४ प्रकार के है और संवेदक मंडल अपने विवेकानुसार फिल्मो को प्रमाण पत्र प्रदान करता है। कई बार इनके कार्यकलापों पर अंगुलिया भी उठती रही है, क्योंकि इस समूह के लिए कुछ निर्धारित मापदंड है जिनके अनुसार उन्हें फिल्मो को प्रमाणपत्र देना होता है।

 

आज वर्तमान में इंटरनेट के जमाने में हमारे पास कुछ भी देखने या पढ़ने कि सुविधा हो चुकी है, इसलिए सेंसर बोर्ड का औचित्य बहुत ज्यादा नहीं बचता है, बावजूद इसके हमारा संवेदक मंडल फिल्मो पर काट छांट करने से बाज़ नहीं आता और फिर जिस भी निर्देशक कि फिल्म होती है वो उन्हें विवादों में घसीट लेता है, कई बार ऐसा भी हुआ है अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा इनके फैसलों को पलटा भी गया है, हालिया उदहारण है MSG – मेसेंजर ऑफ़ गॉड, ऐसे फैसलों कि वजह से ही संसार बोर्ड पर अंगुलिया उठती है।

 

श्री अमोल पालेकर जी द्वारा दायर याचिका इस बात का प्रमाण है कि सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्मो में दखलंदाज़ी कुछ ज्यादा ही होती है जिसके कारण कई फिल्मो को रिलीज़ से पहले ही एक अच्छे खासे कटाई छंटाई के दौर से गुजरना पड़ता है। सेंसर बोर्ड को चाहिए कि वो फिल्मो में ज्यादा काँट छाँट न करके केवल ये देखे कि कही उनमे हमारे राष्ट्र कि एकता या अखंडता को खतरा न हो, हमारे सामाजिक ताने बाने को कोई नुक्सान ना पहुंचे ऐसा ना हो कि फिल्मो को रिलीज़ करना ही खटाई में पड़ जाए। सन १९८३ के ताने बाने से बाहर निकल कर हमें नए नियम बनाने चाहिए जो कि आज के समयानुकूल हो न कि पुरानी दकियानूसी विचारधारा को ढोते रहे। अगर उच्चतम न्यायलय इस याचिका कि सुनवाई करता है और सरकार एवं भारतीय सिनेमा संवेदक मंडल को ये आदेश देता है कि समयानुकूल आमूल चूल परिवर्तन किया जाये तो ये आज के समय में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला माना जाएगा।

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