हनमंत रामदास गायकवाड एक ऐसी विचारधारा जो देश को बदलने की ताकत रखती है…! – दि फिअरलेस इंडियन
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हनमंत रामदास गायकवाड एक ऐसी विचारधारा जो देश को बदलने की ताकत रखती है…!

  • Shyam kadav
  • August 16, 2017
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भारत के उद्योगपतिओं में आज तक हमने देखा होगा की हर कोई उद्योगपति अपने उद्योग समूह को अपने नाम से शुरू करता है. लेकिन भारत में एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने उद्योग समूह की शुरुवात भारत विकास ग्रुप के नाम से शुरू की हलाकि की जिसके नाम में ही भारत का विकास हो उसका वह भारत की परिवर्तन करने की ताकत रखते है. जो बिव्हीजी ने साबित किया है.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था – खुद पर विश्वास करने वाले १०० युवा मुझे दो मैं भारत को दुनिया का सबसे श्रेष्ट राष्ट्र बनाकर दूंगा.  भारत विकास ग्रुप के संस्थापक और अध्यक्ष हनमंत रामदास गायकवाड अपने आप को मौजूदा समय के इन्हीं १०० युवाओं में से एक मानते है. उनका विश्वास वाकई गज़ब का है. इसी विश्वास के बल पर उन्होंने संस्थाओं का एक ऐसा समूह बनाया है जिसने ६५,००० से ज्यादा लोगों को रोज़गार दिया है. १९९७ में महज़ आठ कर्मचारियों से शुरू की अपनी कंपनी को हनमंत राव ने इतना बड़ा बनाया है कि वो आज देश के बीस राज्यों में अपनी सेवाएँ दे रही है. कंपनी के ७०० से ज्यादा क्लाइंट हैं और उसके ग्राहकों की सूची में देश-विदेश की नामचीन कंपनियां शामिल हैं. भारत विकास ग्रुप अलग-अलग तरह की सेवाएँ देने वाली कंपनियों का देश में सबसे बड़ा समूह भी हैं. एशिया महाद्वीप में आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने वाली सबसे बड़ी कंपनी भी यही है. राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, प्रधानमंत्री निवास, दिल्ली उच्च न्यायालय जैसे देश के अत्यंत महत्वपूर्ण स्थानों की देखरेख और साफ़-सफाई की ज़िम्मेदारी भी भारत विकास ग्रुप के पास ही है. देश में १०० से ज्यादा रेल गाड़ियों के रख-रखाव का काम भी हनमंत गायकवाड की कंपनी ही बखूबी निभा रही है.

हनमंत को खुद की काबिलियत, ताकत, विचारों और योजनाओं पर कितना भरोसा है उसका अंदाजा उनके भविष्य के लक्ष्यों को देख-समझकर आसानी से लगाया जा सकता है. गर्व और विश्वास से भरी आवाज़ में वे बताते हैं कि २०२७ तक उनकी कंपनी में १० लाख कर्मचारी होंगे. यानी वे १० लाख लोगों को रोज़गार के अवसर देकर उनकी ज़िंदगी को खुशनुमा बनाने का काम करेंगे. हनमंत सिर्फ २०२७ तक का ही सपना नहीं देख रहे हैं. उनका सपना और भी बड़ा है. सपना सिर्फ बड़ा ही नहीं, बल्कि नायाब भी हैं. हनमंत चाहते हैं कि वे अपने जीवन-काल में १० करोड़ लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा उठाने में उनकी मदद करे. उनका सपना है कि वे अपनी बनाई अलग-अलग संस्थाओं के ज़रिये लोगों की मदद करें ताकि उनका जीवन भी सुखमय, शांतिमय, कांतिमय और प्रगतिशील बने. यानी हनमंत राव १० करोड़ लोगों के जीवन पर अपना सीधा, सकारात्मक और क्रांतिकारी प्रभाव छोड़ना चाहते हैं.

हनमंत के ‘विश्वास’ पर इस वजह से भी यकीन करना आसान हो जाता है क्योंकि उनकी अब तक की कहानी भी कई मायनों में कईयों के लिए अविश्वसनीय ही है. उन्होंने वो सब हासिल किया है जिसकी कल्पना भी कई लोग नहीं कर सकते हैं. उनकी कहानी शून्य से शिखर तक पहुँचने की कहानी है. कहानी फर्श से अर्श तक की है, कौड़ियों से करोड़पति बनने की है. इस बेमिसाल कहानी में गरीबी के थपेड़े हैं, मेहनत, लगन और संघर्ष से कामयाबी हासिल करने के कई सारे प्रेरक प्रसंग हैं. हार न मानने का ज़ज्बा हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं, इस बात को साबित करने वाले कहानी भी है हनमंत की. उनकी विकास-गाथा में कामयाबी के कई मंत्र भी छिपे हैं.

अपनी कामयाबी की अद्भुत और अद्वितीय कहानी के आधार पर ही हनमंत गायकवाड ये कहते हैं कि देश को दुनिया का सबसे समृद्ध और श्रेष्ट राष्ट्र बनाने के लिए स्वामी विवेकनद ने जिन १०० युवाओं की बात कही थी वे खुद को उनमें से एक मानते हैं. हनमंत के लिए स्वामी विवेकानंद और छत्रपति शिवाजी महाराज जीवन के आदर्श हैं. वे एक तरफ जहाँ स्वामी विवेकानंद के आध्यात्म, धर्म और राष्ट्र-निर्माण से जुड़े विचारों को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं तो वहीं छत्रपति शिवाजी के आदर्शों को मानते हुए ‘महाराजा’ की तरह काम करने और जीवन जीने में विश्वास रखते हैं.

हनुमंत रामदास गायकवाड का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के कोरेगाँव में हुआ. उनका पैतृक गाँव रहिमतपुर है. उनके पिता कोर्ट में क्लर्क थे तो माता गृहिणी थीं. हनुमंत बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में तेज़ थे. गणित पर उनकी अच्छी पकड़ थी. जब पिता ने देखा कि उनका लड़का होनहार है तब वे परिवार के साथ सतारा चले आये ताकि बच्चे को अच्छी शिक्षा मिल सके. हनुमंत का दाखिला सतारा के नवीन मराठी स्कूल में कराया गया. हनुमंत पढ़ाई में इतने तेज़ थे कि उन्हें चौथी कक्षा में ही महाराष्ट्र सरकार से छात्रवृत्ति मिल गयी. छात्रवृत्ति के तौर पर हनुमंत को हर महीने १०  रुपये मिलने लगे थे. हनुमंत के लिए ये रकम काफी मायने रखती थी. छोटी-सी उम्र में छात्रवृत्ति ने हनुमंत के बाल-मन पर गहरा प्रभाव डाला था. हनुमंत जान गए कि छात्रवृत्ति अमीर घर-परिवार के बच्चों को नहीं मिली है, बल्कि उन्हें मिली है यानी उनका दिमाग दूसरे बच्चों से तेज़ हैं. इस छात्रवृत्ति ने हनुमंत का आत्म-विश्वास बढ़ाया था और उन्हें इस बात का अहसास दिलाया था कि वे कुछ अलग कर सकते हैं जिससे समाज में उनका मान-सम्मान हो सके.

हनुमंत का परिवार गरीब था और पिता की तनख्वाह पर भी सारा घर-परिवार चलता था. हनुमंत और उनका परिवार सतारा में एक छोटे से मकान में रहता था. १०*१२ फीट वाले उस मकान में बिजली भी नहीं थी. बालक हनुमंत को लगता था कि जिन लोगों के घर में बिजली है वे अमीर हैं और जिनके पास बिजली नहीं है वे गरीब हैं. गरीब होने का अहसास उन्हें दूसरे बच्चों और खुद के जन्म-दिन पर भी होता था. जब दूसरे बच्चों का जन्म-दिन होता तब वे अपने दोस्तों में चॉक्लट बांटते थे, लेकिन परिवार की हालत इतनी मजबूत नहीं थी कि हनुमंत को भी जन्म-दिन पर दोस्तों में बांटने के लिए चॉक्लट दिए जा सकें. हनुमंत का बर्थ डे अमीर बच्चों के बर्थ डे की तरह नहीं होता था. भले ही चॉक्लट न बांटे जाते हों, केक न काटा जाता हो, लेकिन घर पर अपने अंदाज़ में जन्म-दिन मनाया जाता. उन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए हनुमंत ने हमें बताया, “चपाती – गेहूं की रोटी सिर्फ बर्थ डे के दिन ही बनती थी. स्वीट डिश के रूप में ‘सुधा रस’ बनाया जाता था. शक्कर के पानी में नीम्बू निचोड़कर ये ‘सुधा रस’ बनाया जाता था.

कठिनाइयों के दौर, संघर्ष के दिनों, गरीबी की थपेड़ों के बीच हनमंत की पढ़ाई जारी रही थी. पिता का सपना था कि हनमंत आईएएस अफसर बने. हनमंत जब नवीं कक्षा में थे तभी से वे भी कलेक्टर बनने के सपने संजोने लगे थे. हनमंत जानते थे कि कलेक्टर बनने के लिए एग्जाम में अच्छे नंबर लाने ज़रूरी हैं. दिमाग तेज़ था और मेहनत भी खूब करते थे और इसी का नतीजा था कि दसवीं में उन्हें ८८ फीसदी अंक मिले. हनमंत ने दसवीं पास कर ली थी लेकिन उन्हें और उनके परिवारवालों को ये नहीं पता था कि आगे क्या करने और पढ़ने से कामयाबी की राह पकड़ी जा सकती है.  उसके बाद उन्होंने पॉलिटेक्निक के लिए एडमिशन लिया और इसी दौर में उनके पिता का निधन हो गया था. परिवार के लिए ये बहुत बड़ा सदमा था. इस दुखद घटना के बाद हनमंत ने आईएएस अफसर बनने के अपने पिता के सपने को साकार करने की कोशिश तेज़ कर दी थी.

इसके बाद इंजीनियरिंग कॉलेज वाले एडमिशन के लिए एक लाख रुपये की डोनेशन मांग रहे थे. डोनेशन से बचने के लिए हनमंत के शहर से कुछ दूर बने एक इंजीनियरिंग कॉलेज को चुना. माँ ने बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पुणे म्युनिसिपल कोआपरेटिव बैंक के कर्ज लिया. हनमंत का दाखिला विश्वकर्मा इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में हुआ, जोकि उनके मकान से करीब २०-२१ किलोमीटर दूर था. रुपये बचाने के मकसद से हनमंत साइकिल पर कॉलेज जाते थे. इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों में ही हनमंत ने घर-परिवार चलाने में माँ की मदद करने के मकसद से कमाने का फैसला भी लिया. हनमंत पढ़ाई में पहले से ही तेज़ थे और पॉलिटेक्निक डिप्लोमा के पाठ्यक्रम पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी. उन्होंने डिप्लोमा कोर्स के छात्रों को टूइशन देनी शुरू की. हनमंत को उनके दोस्त योगेश आत्रे का साथ मिला था. दोनों मिलकर टूइशन पढ़ाते थे. इतना ही नहीं हनमंत ने एक एजेंसी ली और जैम, सौस भी बेचा.

उसके बाद  १९ साल की उम्र से ही हनमंत के लोगों की मदद करनी शुरू कर दी थी. हनमंत ने समाज-सेवा के मकसद से ‘भारत विकास प्रतिष्टान’ की स्थापना की थी. १९९७ में उनके मित्र उमेश माने ने हनमंत की संस्था के साथ खुद को जोड़ लिया था. यानी भारत विकास प्रतिष्ठान को पहला कॉन्ट्रैक्ट मिलने से पांच महीने पहले ही उमेश संस्था से जुड़ गए थे. इंडिका प्लांट में पहले दो साल तक उमेश की देख-रेख में ही भारत विकास प्रतिष्ठान का काम हुआ था. इंडिका प्लांट के इसी कॉन्ट्रैक्ट से शुरू हुई थी हनमंत के एक कामयाब उद्यमी और कारोबारी बनने की कहानी. इस कॉन्ट्रैक्ट ने हनमंत के विकास को तेज़ रफ़्तार दी. कामयाबी की राह पर हनमंत तेज़ी से आगे बढ़ते चले गए. २२  मई, १९९७  को हनमंत के भारत विकास प्रतिष्ठान को ये कॉन्ट्रैक्ट मिला था. संस्था को पहले साल ८ लाख, दूसरे साल ३० लाख और तीसरे साल करीब ६० लाख की आमदनी हुई.

इसी दौरान १९९९  में हनमंत की शादी भी हुई और भारत विकास प्रतिष्ठान की आमदनी से उत्साहित हनमंत ने नौकरी छोड़ देने और अपना पूरा ध्यान कारोबार में लगाने का मन बना लिया. लेकिन, जैसे ही हनमंत ने नौकरी छोड़ने के अपने विचार को घरवालों से साझा किया माँ गुस्सा हो गयीं. माँ के विरोध के पीछे भी कई कारण थे. एक तो नौकरी अच्छी थी और पक्की भी. घर से दफ्तर भी ज्यादा दूर नहीं था. कई सारी सहूलियतें थीं. हनमंत की शादी हुए भी ज्यादा दिन नहीं हुए थे. और तो और, परिवार की सात पीढ़ियों में किसी ने भी कारोबार नहीं किया था. बेटे के नौकरी छोड़ने के ख्याल ने माँ को बड़ा झटका दिया था. माँ को मनाने के लिए हनमंत को काफी मेहनत करनी पड़ी थी. हनमंत ने माँ को मनाने के लिए कुछ ‘वचन’ दिए थे. हनमंत ने बताया, “ माँ को मैंने यही बोला था कि तुमने मुझे देखा है, १९९०  से मैं कमा रहा हूँ. दस साल हो गए हैं मैं कमा रहा हूँ. ये आठ घंटे की ड्यूटी करके ठीक नहीं रहेगा. मैं नौकरी और बिज़नेस दोनों के साथ जस्टिस नहीं कर पा रहा हूँ. न नौकरी में मन लगता है और न बिज़नेस ठीक से कर पा रहा हूँ. तुमने देखा है कि मैं पैसे कमा रहा हूँ और अच्छे से कमा रहा हूँ. मैंने माँ को वचन दिया –  मैं कोई गलत काम नहीं करूंगा. झूठ नहीं बोलूंगा. ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जिससे तुम्हारे और पिताजी के नाम को बट्टा लगे.  बेटे के ये भावुक वचन सुनने के बाद माँ का मन पिघल गया और उन्होंने हनमंत को नौकरी छोड़ने और कारोबार करने की इज़ाज़त दे दी. और उसके बाद हनमंत गायकवाड एक ऐसी विचारधारा बन गई जो देश को बदलने की काबिलियत रखता है.

साल २००४ में भारत विकास सर्विसेज को एक ऐसी ज़िम्मेदारी मिली जिससे उसकी लोकप्रिय को चार चाँद लगे. इसी साल भारत विकास सर्विसेज को भारतीय संसद की यांत्रिक सफाई का काम मिला. इस काम के लिए निविदाएं आमंत्रित की गयी थीं, जिसके बाद ठेका भारत विकास सर्विसेज को मिला था. आगे चलकर प्रधानमंत्री के निवास और दफ्तर में हाउस कीपिंग का काम भी हनमंत की संस्था को ही मिला. बड़े-बड़े काम मिलने का जो सिलसिला शरू हुआ वो कभी नहीं थमा. हनमंत की संस्था ने दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की करनी शुरू की. ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ती चली गयी. देश के बड़े-बड़े संसथान हनमंत की कंपनी के क्लाइंट बने. सरकारी भवन, रेल गाड़ियां, रेलवे स्टेशन, एअरपोर्ट, कॉर्पोरेट भवन, मंदिर जैसे स्थानों की देख-रेख और साफ़-सफाई की ज़िम्मेदारी हनमंत की संस्था को सौंपी गयी. क्लाइंट जिस तरह की सेवा चाहता, हनमंत की संस्था उस तरह की सेवा देने को तैयार हो जाती. अलग-अलग सेवा देने के लिए अलग-अलग संस्था बनाई गयीं. इन्हीं संस्थाओं के समूह का नाम पड़ा भारत विकास ग्रुप. २०१६  में भारत विकास ग्रुप के कर्मचारियों की संख्या ६५००० को पार कर गयी है.

 

 

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