नोटबंदी को नाकाम बताने की जल्दबाजी, लेकिन… – दि फिअरलेस इंडियन
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नोटबंदी को नाकाम बताने की जल्दबाजी, लेकिन…

  • hindiadmin
  • September 12, 2017
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लोगों को सरकार को ताना मारने के लिए नोटबंदी का एक नया प्लेटफार्म मिल गया है. उसमें ये मीडिया वाले मीर्च-मसला डालके और तड़का देते है. यह तो कुछ भी नहीं, रिजर्व बैंक के नोटों के आंकड़े ने तो नोटबंदी के फैसले के खिलाफ पहले दिन से तर्कों की धार तेज कर रहे लोगों को और धारदार तर्क दे दिया. और तो और इसके दम पर उन्होंने एक पंक्ति में महीनों की नोटबंदी की प्रक्रिया को देश और अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह बता दिया है. उस पर अप्रैल से जून तिमाही में अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार घटना तो नोटबंदी विरोधियों के लिए सोने पर सुहागा जैसा हो गया है. लेकिन क्या हमने कभी हकीकत जानने का प्रयास किया?

देखा जाए तो नोटबंदी के बाद दो लाख से ज्यादा ऐसी कंपनियां चिन्हित कर ली गई हैं जो सिर्फ कर चोरी और काला धन सफेद करने के ही काम में लगी हुई थीं. केंद्र सरकार ने बैंकों को साफ निर्देश दिया है कि ऐसी कंपनियों के खाते तुरंत जब्त किए जाएं ताकि इनमें किसी भी तरह का कोई लेन-देन न हो सके. फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट और वित्त मंत्रालय के दूसरे ऐसे विभागों की महीनों की कड़ी जांच के बाद इन कंपनियों के खाते में लेन-देन रोकने का आदेश जारी किया गया है. सरकारी वेबसाइट पर इन कंपनियों की सूची डाल दी गई है. फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट का ही एक और आंकड़ा है. उस आंकड़े में साफ है कि नोटबंदी के दौरान बैंकों में नकद जमा करीब छह गुना बढ़ गया था. इनमें बड़ी रकम ऐसी है, जिन पर संदेह है कि वह रकम काला धन ही है. खासकर निजी बैंकों में तो ऐसी रकम १० गुना तक ज्यादा जमा की गई है. सालों से बंद पड़े खातों में अच्छी खासी रकम डाली गई है. बैंकों में संदेह के दायरे में जमा की गई रकम छोटी नहीं है. रकम है करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये. अगर फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस और इंटरमीडियरीज की रकम जोड़ ली जाए तो यह आंकड़ा करीब पांच लाख रुपये हो जाता है.

डिजिटल लेन-देन को लेकर ये बात बार-बार कही जाती है कि फिर से नकदी का चलन पुराने स्तर पर आ गया है. साल २०१६-१७ की बात करें तो उसके पिछले साल के मुकाबले डिजिटल लेन-देन में ५५ प्रतिशत की बढ़त देखने को मिली है. अगर विशुद्ध रूप से मनी वैल्यू के लिहाज से देखें तो भी डिजिटल लेन-देन २४ प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है. २०१६-१७ में ८६५ करोड़ ९० लाख डिजिटल लेन-देन हुए हैं. मोबाइल बैंकिंग १२२ प्रतिशत बढ़ी है. आंकड़ों से समझों तो २०१३-१४ में मोबाइल बैंकिंग के जरिये कुल २२४ करोड़ का लेन-देन हुआ था. जबकि २०१६-१७ में मोबाइल के जरिये लेन-देन बढ़कर १०५७२ करोड़ रुपये हो गया.

दरअसल एक बात जो बार-बार कही जा रही है कि नोटबंदी फेल हो गई, क्योंकि सारे नोट वापस आ गए. निश्चित तौर पर सरकार वे तरीका खोजने में असफल रही जिसमें छोटा काला धन रखने वाले या छोटी कर चोरी करने वाले हमारे-आपके जैसे मध्यमवर्गीय लोगों को छोड़ देती और बड़ा काला धन रखने वाले या बड़ी कर चोरी करने वालों को पकड़ लिया जाता, लेकिन क्या ऐसा मंत्र किसी भी सरकार के पास हो सकता है. क्योंकि कानून तो एक ही तरह से काम करेगा. फिर चाहे एक रुपया का काला धन हो या फिर एक लाख करोड़ रुपये का. और सरकार की इसी मजबूरी का फायदा उठाकर काला धन रखने वालों ने अलग-अलग रास्ते से रकम बैंक में जमा कराकर उसे सफेद कर लिया.

एक तर्क और आता है कि नोटबंदी का बहुत नुकसान हुआ है, लेकिन गरीब की अमीरों से चिढ़ और ये भरोसा कि अमीरों का नुकसान ज्यादा हुआ है, इसी वजह से गरीब नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा है. अब जरा इसको भी समझते हैं. कहा जा रहा है कि जबर्दस्त नौकरियां गई हैं. उद्योग-धंधे एकदम से ठप हो गए. लाखों लोग शहरों को छोड़कर अपने गांव लौट गए. इस तर्क को साबित करने के लिए उन उद्योग संगठनों के आंकड़े दिखाए जा रहे हैं, जिन पर यही तर्कशास्त्री आम दिनों में भरोसा नहीं करते हैं. सच ये है कि लाखों रुपये का काला धन गरीबों के पास था ही नहीं. उनकी रकम डूबी नहीं. डूबी तो अमीरों की ही है. अब चूंकि धन काला था. इसलिए १०० रुपये में ३० रुपये गंवाकर भी ऐसे अमीर इस सिद्धांत को प्रतिपादित होने देना चाहते हैं कि गरीब का बड़ा नुकसान हुआ है. लेकिन गरीब तो अपना और काले धन से बने अमीर के नुकसान को ठीक से देख रहा है, इसीलिए वह मानने को तैयार नहीं है.

नोटबंदी फिलहाल पूरी तरह से सफल है. क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बिना लाखों लोगों को जेल भेजे सारा काला धन बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गया, यही सबसे बड़ी सफलता है. काला धन सिस्टम में आने से रियल एस्टेट जैसे सेक्टर में भाव सही स्तर पर आए हैं. इसके पहले काले धन के जोर से मकान-दुकान की कीमतें आसमान पर थीं. इसलिए यह नुकसान बड़े मुनाफे की बुनियाद बन सकता है. अर्थव्यवस्था में अगर तीन-चार लाख करोड़ रुपये का काला धन इस्तेमाल हो रहा था तो जाहिर है कि उस धन के लेन-देन पर लगी रोक से अर्थव्यवस्था में गिरावट होगी ही. इसलिए अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार में कमी और रिजर्व बैंक के पास लौटे पूरे नोटों के आंकड़ों के आधार पर नोटबंदी को असफल बताने वालों को थोड़ा इंतजार कर लेना चाहिए.

हां, अगर इतनी मुश्किलों के बाद दोबारा छोटा या बड़ा काला धन बनाने वाला तैयार होने लगा तो निश्चित तौर पर मैं कहूंगा कि नोटबंदी असफल रही है. फिलहाल नोटबंदी पूरी तरह सफल है. काला धन रखने वाले डर रहे हैं. बस उनका यह डर खत्म न होने पाए. फिर चाहे अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार आधा-एक प्रतिशत नीचे ही क्यों न चली जाए. हम ईमानदारी से प्रतिष्ठित जीवन जीने वाले देश के निवासी बनना चाहते हैं.

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