जन्माष्टमी पर्व- श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्त्व – दि फिअरलेस इंडियन
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जन्माष्टमी पर्व- श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्त्व

  • hindiadmin
  • August 12, 2017
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                                   मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया जमुना के तट पे विराजे हैं

                                   मोर मुकुट पर कानों में कुण्डल कर में मुरलिया  साजे हैं !!

मानव जीवन सबसे सुंदर और सर्वोत्तम होता है. मानव जीवन की खुशियों का कुछ ऐसा जलवा है कि भगवान भी इस खुशी को महसूस करने समय-समय पर धरती पर आते हैं. शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने भी समय-समय पर मानव रूप लेकर इस धरती के सुखों को भोगा है. भगवान विष्णु का ही एक रूप कृष्ण जी का भी है जिन्हें लीलाधर और लीलाओं का देवता माना जाता है.

हर वर्ष श्रावण मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूरे भारतवर्ष में अति श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है. भारत के अलावा विश्व के अन्य देशों में भी कृष्ण भक्ति इस पर्व को अति उल्लास के साथ मनाते हैं और हरे राम हरे कृष्ण की धुन पर भाव विभोर होकर नृत्य करते हैं. जहां बच्चों और युवाओं द्वारा मटकी फोड़ने और दही मक्खन की लुट का आनंद लिया जाता हैं.

इसी दिन चौसठ कलाओं में प्रवीण भगवदगीता के प्रणेता योगीराज श्री कृष्ण का जन्म हुआ था. भगवान श्री कृष्ण हिन्दुओं के पूज्य देवता हैं और उनके जीवन, कर्म और उपदेशों का अनुसरण समस्त विश्व के कृष्ण भक्त करते हैं. उनके जन्म दिन को जन्माष्टमी या कृष्णाष्टमी भी कहा जाता है.

भगवान श्री कृष्ण के कई नाम हैं. गोपाल, श्यामसुंदर, गोबर्धनधारी, दीनदयाल, सावरिया, चितचोर, मुरलीधर, बंशीधर, मोहन, मुरारी, आदि आदि. वे भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार थे. उनके माता पिता देवकी और वसुदेव थे. भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि

परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम् धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे!

अर्थात उनका अवतरण हर युग में दुष्टों का विनाश करने, साधुओं की रक्षा करने और धर्म की स्थापना के लिये होता है. भगवान श्री कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा गया है. इसलिए हमें उनका बहु आयामी व्यक्तित्व दिखाई देता है. वे परम योद्धा थे, लेकिन वे अपनी वीरता का प्रयोग साधुओं के परित्राण हेतु करते थे. वे एक महान राजनीतिज्ञ थे लेकिन उन्होंने इस राजनैतिक कुशलता का प्रयोग धर्म की स्थापना हेतु किया. वे परम ज्ञानी थे. उन्होंने अपने ज्ञान का उपयोग लोगों को धर्म के सरल और सुगम रूप को सिखाने में किया. वे योगीराज थे. उन्होंने योगबल और सिद्धि की सार्थकता लोग मंगल के कार्य को करने में बताया न कि उसका प्रयोग किसी अन्य स्वार्थसिद्धि के किया जाना चाहिए. वे योग के सबसे बड़े ज्ञाता, व्याख्याता और प्रतिपालक थे.

भगवान श्री कृष्ण महान दार्शनिक और तत्वदर्शी थे. महाभारत के युद्ध के आरम्भ में अर्जुन को अपने पूरे कुलक्षय होने की आशंका सताती है. अपने ही बन्धुओं को मारने के भय से वे अपनी गांडीव जमीन पर रख देते हैं. अर्जुन को गीता का उपदेश देकर कृष्ण कर्मण्येवाधिकारस्ते की व्याख्या करते हैं और अपना विराट रूप दिखाकर उनका मोह भंग कर देते हैं. यदि पांडव महाभारत का युद्ध जीत गए तो इसमें सबसे बड़ा श्रेय श्री कृष्ण की कूटनीति को जाता है. महाभारत में अधर्म की हार होती है और समाज में जन जन तक धर्म का सन्देश पहुँचता है. वे भागवत धर्म के प्रवर्तक थे. आगे चलकर उनकी स्वयं की उपासना की जाने लगी. दर्शन में इतिहास शामिल हो गया. फलतः कृष्ण के ईश्वरत्व और ब्रह्मपद की स्थापना हुई.

श्री कृष्ण का जीवन-
श्रीकृष्ण के जीवन की दो बातें उनको अवतारी सिद्ध करती है. पहला है उनके जीवन में कर्म की निरंतरता. वे कभी भी निष्क्रिय नहीं रहे. कृष्ण का बालपन जितनी घटनाओं से भरी पड़ी है यौवन भी उसी तरह से है. कारागृह के जन्म, यमुना पार कर गोकुल तक वसुदेव जी का जाना, दूध पीते वक़्त पूतना का वध, बक, कालिय और अघ का दमन आदि बालपन की घटनाएं हैं. किशोरवय प्राप्त करते ही गोपियों से मित्रता, कंस का दलन किया. युवा होते ही अति सक्रिय, कोई भी ऐसी महत्वपूर्ण घटना नहीं, जहाँ वे उपस्थित न हों. महाभारत की लड़ाई में धनुर्धारी अर्जुन के सारथी बने. उनकी सक्रियता हमेशा बनी रही.

जन्माष्टमी कैसे मनाते हैं?
हिंदू धर्म में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन उनकी आराधना उपवास रखकर करते हैं. शाम होते ही लोग मंदिरों में पूजा पाठ के लिये एकत्रित होने लगते हैं. रात के बारह बजे भगवान श्री कृष्ण का जन्म होता है. लोग उनका प्रसाद ग्रहण कर अपना उपवास तोड़ते हैं.

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान कई स्थानों पर भव्य मेला का आयोजन किया जाता है. वृन्दावन, मथुरा, द्वारका, तेघरा (बिहार) आदि अनेक स्थानों पर बहुत ही शानदार मेला का आयोजन होता है. यह मेला कई दिनों तक चलता है. कई पंडाल बनाये जाते हैं और इनमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुडी घटनाओं को मूर्ति द्वारा झांकी स्वरुप बनाया जाता है. सम्पूर्ण वातावरण कृष्णमय हो जाता है. सर्वत्र श्री कृष्ण के चरित्र का गुणगान किया जाता है. रास लीला में कृष्ण की लीलों को दिखाया जाता है.

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव यानि कृष्णाष्टमी (जन्माष्टमी)  प्रतिवर्ष आता है और हमें कुछ सन्देश देकर चला जाता है. ईश्वर की शरणागति और ईश्वर प्रेम हमारे आत्मिक उत्थान के लिये बहुत जरुरी है. जय राधे राधे! जय श्री कृष्ण!

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