कश्मीर समस्या – गलती किसकी – दि फिअरलेस इंडियन
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कश्मीर समस्या – गलती किसकी

  • Amit Pradhan
  • April 24, 2017
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कश्मीर जिसके बारे में कभी कहा जाता था की धरती पर कही स्वर्ग है तो यही है, आज उस कश्मीर की वादियाँ झुलस रही है, रोज नए बखेड़ों का सामना कर रही है, पत्थरबाजों अलगाववादियों और आतंकवादियों के साये में रहने के लिए लोग मजबूर हो रहे है, क्या कश्मीर शुरू से ऐसा था? क्या हमारे राजनेताओ की गलती है या थी जो आज तक कश्मीर सुलग रहा है? क्या इस समस्या का कोई हल था या है? आखिर क्यों इस हसीन घाटी में लगातार खून की नदिया बहाई जा रही है, आइये कोशिश करते है सच को जानने की।

 

बारहवीं शताब्दी के मध्य में लिखे गए इतिहास और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कश्मीर पहले एक झील थी जिसे ऋषि कश्यप द्वारा वराह मुल्ला के पहाड़ो में दर्रा बना कर सुखा दिया गया था, जब कश्मीर को सुखा दिया गया तो ऋषि कश्यप ने ब्राम्हणो को वहां निवास करने का आमंत्रण दिया, इसके बाद कश्मीर कई सल्तनतों के हाथो से गुज़रा जिसमे मंगोल, मुग़ल और सिख प्रमुख रहे, इनके बाद सं १८४५ में २ समझौतों के तहत श्री गुलाब सिंह को कश्मीर का शाशक नियुक्त किया गया, आखिरी राजा, राजा हरी सिंह जिन्होंने कश्मीर की सत्ता १९२५ में संभाली, कश्मीर में दंगो की शुरुआत भी इन्ही के साशन काल में हुई, सन १९४७ में जब भारत का विभाजन हुआ उस समय कश्मीर घाटी में ७७% मुस्लिम और २० प्रतिशत हिन्दू आबादी थी, अक्टूबर १९४७ राजा हरी सिंह के खिलाफ दंगे भड़क गए और पश्तून पुंछ विद्रोहियों के साथ मिलकर जम्मू और कश्मीर में मार काट मचाने लगे, उनका एकमात्र अभिप्राय राजा हरी सिंह को डराना था ताकि वो भारत के साथ ना मिले। राजा हरी सिंह ने ऐसे समय में भारत से मदद की गुहार लगाई और स्वीकृति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए तो भारतीय सेना कश्मीर से पश्तूनों को खदेड़ने के काम में जुट गई।

 

ऐसे समय में हमारे उस समय के शाशको की गलतिया है जिनका भुगतान हम आज कश्मीर समस्या के रूप में कर रहे है, छद्म धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा उस समय से हमारे शाशको के चेहरे पर लगा हुआ है, उस समय श्री जवाहर लाल नेहरू और श्री गाँधी दोनों के ऊपर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा, ऐसे समय में जब कश्मीर की समस्या को उसी समय जड़ से ख़त्म कर देना चाहिए था और उस समय कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला को तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा कैद करवा दिया गया, उससे अच्छा था की उन्हें उनका प्रयोग कश्मीर समस्या के हल के लिए करना चाहिए था, शेख अब्दुल्ला कश्मीर के लिए स्वायत्ता, धरा ३७० जैसे मुद्दों की मांग कर रहे थे और नेहरू ने उनकी लगभग सारी मांगो को स्वीकार भी कर लिया था, शायद उस समय अगर शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का शाशन सौंप दिया जाता तो उसी समय आज़ादी की मांग को कुचला जा सकता था। शेख अब्दुल्ला के वारिसों को कश्मीरियों से वो भरोसा कभी प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि कश्मीरी उन्हें कांग्रेस या भारत का पिट्ठू समझते रहे, और विडम्बना देखिये की जिस भारतीय जनता पार्टी और जन संघ जिसे की कश्मीर की आज़ादी से आपत्ति रही है उन्होंने कश्मीर में ३ में से दो सफल चुनावो में अपनी भूमिका निभाई, शायद यही वजह है की कश्मीर में पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह से ज्यादा विश्वसनीयता और वैद्यता पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को मिलती है।

 

१९४७ में नेहरू की विफलता का एक बहुत बड़ा कारण नेहरू का बाबा साहब भीम राव आंबेडकर और सरदार पटेल पर भरोसा ना करना भी रहा, जिस समय एक गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल नित नयी उचाईयो को छू रहे थे और उन सभी राज्यों को भारत में मिलाते जा रहे थे जिनसे कही भी कोई खट पट रही हो, लेकिन कश्मीर का हल सरदार पटेल के हाथ  में नहीं छोड़ा गया, उस समय के ज्ञात स्रोतों से पता चलता है कि सरदार पटेल का कहना था कि अगर उन्हें कुछ और दिन मिले तो कश्मीर समस्या का समाधान कर देंगे, लेकिन ऐसा कुछ होने से पहले ही नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र कि शरण में जाना उचित समझा, उससे कुछ फायदे भी हुए, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी, भारतीय सेना को अपने सैनिको को कश्मीर में रखने कि आज़ादी मिली, साथ में ये भी हुआ कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाए, जिसका भुगतान कश्मीर कि वादियों में हिन्दुओ के ऊपर अत्याचार के रूप में सामने आया और उन्हें अपना घर द्वार छोड़ कर शरणार्थी बनना पड़ा।

 

आज भी हमारे देश के नेता कश्मीर समस्या को सुलझाने नहीं देना चाहते है, जैसे ही केंद्र में बैठी सरकार कुछ करने कि कोशिश करती है तो छद्म धर्म निरपेक्ष लोगो कि जबान खुल जाती है और वो मानवाधिकार का रोना ले कर बैठ जाते है, ऐसा नहीं है कि इसमें केवल नेता ही शामिल है, कुछ पढ़े लिखे लोग और डिज़ाइनर पत्रकार भी अपना रोना ले कर बैठ जाते है। कश्मीर समस्या को सुलझाने का तरीका बात और थोड़ी जोर जबरदस्ती ही है, जैसा कि पंजाब में जब भिंडरावाले अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे उस समय कठोर करवाई करके उस आंदोलन को ख़त्म किया गया ताकि पंजाब शांत रहता, उसी प्रकार से कश्मीर में भी थोड़ी कठोरता कि जरुरत है ताकि इस समस्या का एकबारगी समाधान  किया जा सके।

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