क्या हिंदुत्व एक धर्म है???? – दि फिअरलेस इंडियन
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क्या हिंदुत्व एक धर्म है????

  • Amit Pradhan
  • April 28, 2017
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हिन्दू संस्कृति को मानने वाले आज करोडो लोग विश्व के कोने कोने में फैले हुए है, और इनमे लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है, आज के परिप्रेक्ष्य में ये विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता/धर्म है, हालांकि इसे धर्म की तरह मानने वाले करोडो लोग मिल जाएंगे, लेकिन आज भी हमारी इस संस्कृति में कई मिथ्याएँ मौजूद है जिसे हम आँखे मूँद कर मान लेते है, ऐसा शायद इसलिए की हमारे बड़े बुजुर्गो ने हमें ऐसा बताया है, उदहारण के लिए पीपल का पेड़ घर में नहीं लगाना चाहिए, मंगलवार शनिवार जैसे कुछ विशेष दिनों में हज़ामत नहीं बनानी चाहिए इत्यादि ऐसे हज़ारो उदहारण है जिन्हें हम आँखे मूंदे मानते चले आ रहे है, क्या हमने कभी ये सोचने की कोशिश की आखिर ऐसी मान्यताये हमारी संस्कृति/धर्म में क्यों है? क्या है इनका वैज्ञानिक आधार? आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में जहा १० रुपये खर्च करने से पहले हम १० बार सोचते है, वहां हमारी मान्यताओ के बारे में सोचने का समय क्या हमारे पास है, आइये एक कोशिश करते है हमारी अमूल्य धरोहर को आज के विज्ञान की कसौटियो पर कसने की और अपनी उन मान्यताओ को जानने समझने की जिसे आज की युवा पीढ़ी सिरे से नकार रही है उसको अधिक से अधिक जानने समझने की।

शुरुआत करते है की हिन्दू धर्म क्या है?

हिन्दू धर्म – हिंदू कोई धर्म नहीं है। यह तो बस एक संभावना है, एक संस्कृति है एक विचार है। यहां हर कोई वह सब करने को आजाद है, जो वह चाहता है। धर्म तो किसी एक विशेष व्यक्ति को मानने की वकालत करती है, एक हिन्दू संस्कृति ही है जो किसी व्यक्ति विशेष को मानने की सलाह नहीं देती है, जिसने अपने लोगों को ऐसी आजादी दी हो। बाकी के धर्मो में इस बात पर जोर था, कि लोगों को ऐसी किसी न किसी चीज में श्रद्धा रखनी ही चाहिए, जो उस संस्कृति में प्रभावशाली है। अगर कोई उसमें भरोसा नहीं करता था, तो उसे अपने आप ही उस सभ्यता का शत्रु मान लिया जाता था। इस गुनाह के लिए या तो उसे सूली पर चढ़ा दिया जाता था, या फिर जला दिया जाता था। लेकिन हिन्दू सभ्यता में कभी इस तरह के उत्पीडऩ की परंपरा नहीं रही, क्योंकि किसी का कोई विशेष मत है ही नहीं। आप अपने घर के अंदर ही देख लीजिए। पति एक देवता की पूजा करता है, तो पत्नी किसी दूसरे की, और बच्चे किसी और देवता को मानते हैं। इसमें किसी को कोई समस्या नहीं है। ये संस्कृति तो नास्तिक, आस्तिक, तामसिक, राजसी सारे मतों का अनुमोदन करती है और इसका मुख्य उद्देश्य ही है आज की दशा में सुखी समृद्ध जीवन यापन, हर कोई अपने हिसाब से चल सकता है। लेकिन इस संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है – कि हर कोई अपनी मुक्ति के लिए कोशिश करता है।

जैसा की इस शीर्षक से ही आपने सोचना शुरू कर दिया होगा कि आखिर इस लेख का उद्देश्य क्या है, आइये अब इस संशय को दूर करते हुए हम आगे बढ़ते हैI हम में से कई लोगो के दिमाग में ऐसे सवाल आते है की आखिर इस संस्कृति में इतनी सारी चीज़े क्यों मानी जाती है जैसे की, वृक्षो की पूजा, घर में वृक्षो का प्रादुर्भाव, तंत्र, मन्त्र, हमारी अलग अलग मान्यताये, उनको मानना या ना मानना, पूजा पद्धत्ति और उनसे होने वाले लाभ और हानिया, विभिन्न मतों का संग्रह इत्यादि।

ग्रह और उन्हें कैसे हमारे जीवन में जोड़ा गया, क्या अभिप्राय है आज हमारे द्वारा पहने हुए पत्थरो का, उनके जगह वृक्षो की जड़े क्यों पहने, कैसे पहने और इनका वैज्ञानिक आधार क्या है? ऐसी बहुत सी बाते है जो यहाँ लिखना लगभग असंभव है कुछ और उदहारण लेते है जैसे हिन्दुओ की मान्यता है की उनके ३३ करोड़ देवी देवता है लेकिन ये सत्य नहीं है सत्य है ३३ कोटि देवी देवता है, कोटि संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है प्रकार (Type) जिसे समय के साथ जाने या अनजाने में करोड़ में परिवर्तित कर दिया।

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