१२ साल बाद एक बार फिर मुंबई बारिश की दहशत में – दि फिअरलेस इंडियन
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१२ साल बाद एक बार फिर मुंबई बारिश की दहशत में

  • hindiadmin
  • August 31, 2017
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१२ साल बाद मुंबई एक बार फिर बारिश की वजह से दहशत में है. सड़कों पर जाम है. रेल यातायात और हवाई यातायात प्रभावित है. सहमी-सहमी सी मुंबई को देखते हुए एक सवाल जेहन में आता है कि २६ जुलाई २००५ के बाद मुंबई को मानसून में डूबने से बचाने के लिए जो कसमें खाई गई थीं-उनका क्या हुआ.

क्योंकि ध्यान दीजिए तो जुलाई २००५ के झटके के बाद बीएमसी ने बृहन्मुंबई स्ट्रॉर्मवाटर ड्रेनेज प्रोजेक्ट का ऐलान किया था, जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है. इस प्रोजेक्ट के तहत आठ पंपिंग स्टेशन लगने थे, जिसमें से आज तक महज छह ही लग पाए हैं.

इस दौर में जो प्रोजेक्ट १२०० करोड़ रुपए में पूरा होना था, उसकी लागत बढ़कर ४००० करोड़ से ज्यादा हो गई है. और हद ये कि १२ साल में जो बीएमसी ८ पंपिंग स्टेशन नहीं लगा पाई-वो आज छह पंपिंग स्टेशनों के चलने की दुहाई देकर खुद का बचाव कर रही है.

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि एशिया के सबसे ज्यादा बजट वाली महानगरपालिका अगर हर साल मानसून के मौसम में अपनी तैयारियों को लेकर कटघरे में खड़ी होती है तो फिर उसके होने का मतलब क्या है? ये सवाल इसलिए क्योंकि बीएमसी हर साल मॉनसून की तैयारियों के नाम पर एक हजार करोड़ रुपए खर्च करती है. बीते तीन साल में सिर्फ नालों की सफाई, सड़कों को गड्ढों से मुक्त करने और ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त करने के नाम पर तीन हजार करोड़ से ज्यादा खर्च करने का दावा किया गया है.

पानी-पानी हुई मुंबई के बीच बीएमसी की भूमिका क्या है?

अंग्रजों के जमाने का ड्रेनेज सिस्टम-
मुंबई में अंग्रेजों के जमाने का ड्रेनेज सिस्टम आज तक सुधरा नहीं है. हाई टाइड की वजह से मुंबई के ड्रेनेज सिस्टम का पानी वापस शहर की ओर आ जाता है और यह समस्या वर्षों की है. बीएमसी के अधिकारियों की ही मानें तो अभी नालों की जल निकासी क्षमता २५ मिलीमीटर प्रति घंटे की है, जबकि आदर्श स्थिति में यह क्षमता ७५ मिलिमीटर होनी चाहिए. लेकिन ऐसा होगा कब-कोई नही जानता क्योंकि ड्रेनेज सिस्टम को बेहतर बनाने का उद्देश्य बृहन्मुंबई स्ट्रॉर्मवाटर ड्रेनेज प्रोजेक्ट में रखा गया है-लेकिन प्रोजेक्ट आज तक पूरा हुआ नहीं है.

मुंबई में बारिश के बीच विफल होती बीएमसी को देखते हुए दो सवाल अहम हैं 
१.पहला, क्या बीएमसी ने मुंबई को उसके हाल पर छोड़ दिया है? यानी बीएमसी को लगता है कि मुंबई में भारी बारिश के बीच लोगों को समस्याओं की आदत है और यह दो चार दिन का झमेला भर है.
२.या बीएमसी इतनी काबिल ही नहीं है कि वो महानगर मुंबई की बारिश से निपट सके?

सबसे रईस महानगर पालिका की चूक-
वैसे मुद्दा सिर्फ बारिश के बीच बीएमसी के विफल होने भर का नहीं है. बीएमसी के बजट पर गौर करें तो ये कई छोटे राज्यों से ज्यादा है. साल २०१७-१८ के लिए बृहन्मुंबई महानगर पालिका का बजट २५,१४१ करोड़ रुपए है. बेंगलुरु, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई की महानगर पालिकाओं का कुल बजट २०१७-१८ का २७,२०१ करोड़ रुपए है. यानी चारों महानगर की महानगर पालिकों का बजट मुंबई की महानगर पालिका से महज २००० करोड़ ही अधिक है. और यह हालात भी सिर्फ इस साल हुए हैं अन्यथा मुंबई महानगर पालिका का बजट ३५ हजार करोड़ से अधिक होता है. साल २०१६-१७ में यह बजट ३७ हजार करोड़ रुपए से अधिक था.

लेकिन एशिया की सबसे रईस महानगर पालिका के कंधे पर जो जिम्मेदारियां हैं, उन्हें निभाने से वो पूरी तरह चूक चुकी है. उदाहरण के लिए मुंबई में फुटपाथ चलने लायक नहीं रहे. इस कदर संकरे हो गए हैं कि चलना दूभर है. नेशनल सर्वे ऑफ अर्बन वाकेबिलिटी के मुताबिक दिल्ली और चंडीगढ़ की तुलना में मुंबई में फुटपाथ पर चलना दुश्कर है. बीएमसी का अपना सर्वे कहता है कि मुंबई में ६१७ इमारतें जर्जर हैं, जबकि गैर सरकारी संस्थाओं का आंकड़ा कहता है कि १० हजार से ज्यादा जर्जर इमारतों में ५ लाख से ज्यादा लोग जान हथेली पर लेकर जी रहे हैं, लेकिन बीएमसी तब तक कुछ करती नहीं दिखती जब तक कोई हादसा न हो जाए.

आज सुबह का ही हादसा ले लीजिये, दक्षिण मुंबई के भिंडी बाजार इलाके में तीन मजला इमारत गिर गई. उसमे कई लोगों की जान चली गई, तो कई लोग जखमी हालत में है. अब इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अगर समय रहते ही बीएमसी ने कुछ किया होता तो आज ये लोग चैन की सांस ले रहे होते. लेकिन यहा भी राजनीती, भ्रष्टाचार आड़े आती है और फिर आम जनता को दोष दिया जाता है.

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बीएमसी के स्कूलों लचर हालत-
बीएमसी के स्कूलों में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है. गर्मियों में पीने के पानी की किल्लत अब नियमित हो चुकी है. कई वार्ड मे फायर स्टेशन और पार्किंग नहीं हैं. जहां फायरस्टेशन हैं, वहां कर्मचारियों की कमी है. बीएमसी संचालित अस्पतालों में डॉक्टरों से लेकर सफाई कर्मचारियों तक की कमी है. मुंबई टीबी कैपिटल बनती जा रही है, जिस पर अंकुश मुश्किल हो रहा है.

भ्रष्टाचार का आलम यह है कि जुलाई २०१५ से जुलाई २०१७ के बीच एंटी करप्शन ब्यूरो ने बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन यानी बीएमसी के ५५ अधिकारियों के खिलाफ ४५ भ्रष्टाचार के ४५ मामले दर्ज किए.

तो सवाल यही कि दोष किसे दिया जाए? बीएमसी पर बीते २१ साल से शिवसेना-बीजेपी का कब्जा है. महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना ही अरसे से सत्ता में है. लेकिन बीएमसी का हाल बुरा है और बीएमसी की पोल एक बार फिर खुल चुकी है. दिक्कत यह है कि इस बार भी बीएमसी अपनी खामियों से कुछ सीखेगी-ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती.

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