निर्भया पर आया उच्चतम न्यायालय का फैसला – दि फिअरलेस इंडियन
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निर्भया पर आया उच्चतम न्यायालय का फैसला

  • Amit Pradhan
  • May 5, 2017
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१६ दिसम्बर २०१२ की रात देश की राजधानी दिल्ली में ६ लोगो ने २३ साल की मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में बलात्कार किया था, देश को झकझोर देने वाले इस केस में उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने इस मामले के दोषी अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश की फांसी की सजा कायम रखी है। इस मामले में ४ दोषियों को निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई थी, १ दोषी ने ट्रायल के दौरान ही आत्महत्या कर ली थी और एक दोषी जो की नाबालिग था उसे ३ किशोर अदालत द्वारा ३ साल तक किशोर गृह में रखने की सजा सुनाई गई थी।

आज उच्चतम न्यायलय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया और सामूहिक बलात्कार के चारो आरोपियों की मौत की सजा बरकरार रखी, इस मामले में बलात्कार की शिकार पीड़ित युवती की १३ दिनों तक मौत से जूझने के बाद मृत्यु हो गई थी। ये फैसला अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है, लेकिन इस फैसले के बाद देश में फिर से एक बार फांसी की सजा के ऊपर बहस छिड़ने के आसार है, इसकी शुरुआत बचाव पक्ष के वकील ने कर भी दी है, बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है। हर शख्स को जीने का अधिकार है। वकील के मुताबिक, जिसने जिंदगी दी है, उसे ही वापस लेने का अधिकार है। उन्होंने कहा, ‘समाज में मेसेज देने के लिए मौत की सजा नहीं दी जा सकती। हम फैसले की कॉपी पढ़ने के बाद रिव्यू पिटिशन दाखिल करेंगे।’

तत्कालीन सरकार ने जनता के भारी दबाव के बाद निर्भया को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संसथान से सिंगापुर के इलाज के लिए भेज दिया था, उनके इस कदम से उसी समय कई सवाल खड़े हो गए थे, क्या तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार पहले ही दिन ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती थी? क्या निर्भया को सिंगापुर भेजने से पहले उसकी हालत इतनी ख़राब हो चुकी थी की उसे बचा पाना असंभव था? क्या देश को चलने के लिए और उस समय जनता को दिखाने के लिए ये कदम उठाया गया था? तत्कालीन सरकार अगर किसी दबाव के बिना सही समय में सही कदम उठाती तो कम से कम निर्भया की ज़िन्दगी तो बचाई ही जा सकती थी, लेकिन तत्कालीन सरकार द्वारा इस मामले में लीपा पोती की जाती रही और जिसका नतीजा ये हुआ की जनता सड़को पर उतर कर निर्भया के लिए इन्साफ की मांग करने लगी।

निर्भया कांड में फैसला आने में साढ़े चार साल का समय लगा और इस दौरान एक दोषी की मौत भी हो चुकी थी, क्या ये देरी हमारी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़े करती है? पुरानी कहावत है “न्याय में देरी का अर्थ है न्याय से वंचित होना” और इस मामले में भी कहीं ना कही हमारे देश के पुरातन कालीन क़ानून न्याय में देरी का कारण बने, मोदी सरकार द्वारा ऐसे कई कानूनों को ख़त्म करना एक सराहनीय कदम है, लेकिन अभी भी हमारी न्याय प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि आम नागरिक को समय से न्याय मिल सके।

क्या हमारे समाज में ऐसे दरिंदो को जीवनदान दिया जा सकता है जो दूसरे के मानवाधिकारों का उल्लंघन करें, क्या निर्भया को जीने का अधिकार नहीं था? क्या निर्भया के साथ जो हुआ वो सही था? अगर आपका जबाब ना है तो फिर ऐसे दरिंदो को फांसी देना मानवाधिकारों का उल्लंघन कैसे हुआ? उच्चतम न्यायलय का ये फैसला अपने आप में इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे समाज में एक सन्देश जाएगा और शायद ऐसे घिनौने कृत्यों पर कुछ तो लगाम लगाईं जा सकेगी।

इस पुरे प्रकरण में एक दोषी जिसकी उम्र १७ साल थी, उसे केवल ३ साल सुधार गृह में रख कर छोड़ दिया गया, उसे केजरीवाल सरकार द्वारा जीवन यापन हेतु सिलाई मशीन और १०००० रुपये भी दिए गए थे। क्या ऐसा करना उचित था? अगर कोई इंसान बलात्कार या क़त्ल जैसा घिनौना अपराध कर सकता है तो उसे नाबालिग कहना कहा तक उचित है? हमारी सरकार को चाहिए की वो नाबालिग की परिभाषा पर फिर से विचार करे और ऐसे घिनौने कृत्यों के दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलाना सुनिचित करवाए।

दिल्ली में हुए इस निर्भया कांड को शायद रोका भी जा सकता था, लेकिन तत्कालीन सरकारों की इच्छा शक्ति की कमजोरी ही कही जायेगी की आज भी हमारे देश में रोज इस तरह की घटनाएं घटित होती रहती है, उच्चतम न्यायालय के इस अभूतपूर्व फैसले के बाद सरकार का भी दायित्व बनता है की वो ऐसे कठोर कानून लाये जो आने वाले समय में लोगो को ऐसे घृणित कार्य करने से रोकने में सक्षम हो। हमारे समाज को भी अपने आप में बदलाव लाना होगा और “उसके साथ हो रहा है तो होने दो” की मानसिकता से बाहर निकल कर एक आदर्श समाज की स्थापना करनी होगी।

इस फैसले का आगे जो भी असर हो, कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा इस पर हो हल्ला मचाया जाना तय है, उन तथाकथित बुद्धिजियो से एक प्रश्न, निर्भया के साथ जब ये घटना हो रही थी तब उन्होंने अपने मानवाधिकार के झंडे को कहा छुपा रखा था, किसी महिला को प्रेम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उसके पास हमेशा ना कहने का अधिकार है, फिर ऐसे दरिंदो ने उसके साथ जो किया उसे कहाँ तक उचित ठहराया जा सकता है? हमारी नज़र में उच्चतम न्यायालय ने एक अभूतपूर्व फैसला दिया है और देश और समाज के सामने एक नज़ीर पेश की है, इस फैसले का दूरगामी असर आने वाले समय में जरूर दिखाई देगा और ये फैसला औरतो और बच्चियों की सुरक्षा की दिशा में उठाया गया एक अभूतपूर्व कदम साबित होगा, इस फैसले के साथ ही आज फिर से न्याय की जीत हुई और दोषियों को उनके किये की सजा से अब कोई नहीं बचा सकता।

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