दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी… और अब गौरी लंकेश – दि फिअरलेस इंडियन
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दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी… और अब गौरी लंकेश

  • hindiadmin
  • September 6, 2017
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वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या के बाद एक बार फिर से व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. हमलावरों ने गौरी लंकेश के घर में घुसकर उन्हें गोली मार दी गई. पिछले कुछ साल पर नजर डालें तो कई मौकों पर पत्रकारों की हत्या कर दी गई. हमारे देश के संविधान में पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दर्जा दिया गया है, लेकिन जब कतिपय लोगों के निहित स्वार्थों में सच्चे पत्रकार अवरोध पैदा करते है तो उनका हश्र गौरी लंकेश की तरह कर दिया जाता हैं. गौरी एक स्वाभिमानी महिला पत्रकार थीं जो अपनी स्पष्टवादिता के लिए जानी जाती थीं. वैसे पत्रकारों पर हमले की यह कोई पहली घटना नहीं हैं. हाल के कुछ वारदातों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि इस पेशे से जुड़े लोगों का जीवन खतरे में है. काँटों भरी इस राह पर कई लोगों ने अपनी जान गंवाई हैं.

आइए हाल के उन वारदातों पर नजर डालें जिसमें पत्रकार की हत्या कर दी गई-

-१३ मई २०१६ को सीवान में हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर हत्या कर दी गई. ऑफिस से लौट रहे राजदेव को नजदीक से गोली मारी गई थी. इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है.

-मई २०१५ में मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की कवरेज करने गए आजतक के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. अक्षय सिंह की झाबुआ के पास मेघनगर में मौत हुई. मौत के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है.

-जून २०१५ में मध्य प्रदेश में बालाघाट जिले में अपहृत पत्रकार संदीप कोठारी को जिंदा जला दिया गया. महाराष्ट्र में वर्धा के करीब स्थित एक खेत में उनका शव पाया गया.

-साल २०१५ में ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जला दिया गया. आरोप है कि जगेंद्र सिंह ने फेसबुक पर उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री राममूर्ति वर्मा के खिलाफ खबरें लिखी थीं.

-साल २०१३ में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान नेटवर्क18 के पत्रकार राजेश वर्मा की गोली लगने से मौत हो गई.

-आंध्रप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एमवीएन शंकर की २६ नवंबर २०१४ को हत्या कर दी गई. एमवीएन आंध्र में तेल माफिया के खिलाफ लगातार खबरें लिख रहे थे.

-२७ मई २०१४ को ओडिसा के स्थानीय टीवी चैनल के लिए स्ट्रिंगर तरुण कुमार की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई.

-हिंदी दैनिक देशबंधु के पत्रकार साई रेड्डी की छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में संदिग्ध हथियारबंद लोगों ने हत्या कर दी थी.

-महाराष्ट्र के पत्रकार और लेखक नरेंद्र दाभोलकर की २० अगस्त २०१३ को मंदिर के सामने बदमाशों ने गोलियों से भून डाला था.

-रीवा में मीडिया राज के रिपोर्टर राजेश मिश्रा की १ मार्च २०१२ को कुछ लोगों ने हत्या कर दी थी. राजेश का कसूर सिर्फ इतना था कि वो लोकल स्कूल में हो रही धांधली की कवरेज कर रहे थे.

-मिड डे के मशहूर क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की ११ जून २०११ को हत्या कर दी गई. वे अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कई जानकारी जानते थे.

-डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के खिलाख आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की सिरसा में हत्या कर दी गई. २१ नवंबर २००२ को उनके दफ्तर में घुसकर कुछ लोगों ने उनको गोलियों से भून डाला.

-२० फ़रवरी २०१५ की एक सुबह कोल्हापुर में कम्युनिस्ट विचारक गोविंद पानसरे जब अपनी पत्नी के साथ सुबह टहलने निकले थे उन पर मोटरबाइक सवार दो लोगों ने जानलेवा हमला किया. पांच दिनों बाद मुंबई के अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया.

-प्रमुख भारतीय विद्वान और जाने-माने तर्कवादी विचारक डॉक्टर एमएम कलबुर्गी की हत्या २० अगस्त,२०१५ को  कर्नाटक में उनके घर के दरवाज़े पर कर दी गई थी.

क्या पत्रकारों को आवाज बुलंद करने के बदले अपनी जान गंवा देना है? अगर ऐसा ही है तो कोई क्यों अपने सोच-विचार बयां करेगा? क्यों आलोचना कर अपनी जान गंवा देगा? क्या हमारे देश में गलत के खिलाफ बोलना पाप है? यह सब हमारे देश में ही नहीं बल्की दुसरे देशों में भी पत्रकारों को सरेआम मारा जाता है. या यूही सरकार कहती रहेगी, मामले में पूरी गंभीरता के साथ जांच चल रही है. लेकिन क्या हुआ उस जांच का? जिनकी अबतक हत्या हुई उनके अपराधियों को पकड़ा गया? क्या उन्हें सजा दी गई? लेकिन नहीं बेबाक विचारों और मुखर व्यवस्था विरोधी आवाज को दबा दिया गया. सवाल तो उठेंगे, क्योंकी देश को याद है दाभोलकर की हत्या, कलबुर्गी की हत्या, पनसारे की हत्या, इन जैसे कई पत्रकारों की हत्या और अब देश याद रखेगा वरिष्ठ महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या.

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