हत्या पर भी राजनीती करने से नहीं चूकते ‘सेक्युलर पत्रकार’ – दि फिअरलेस इंडियन
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हत्या पर भी राजनीती करने से नहीं चूकते ‘सेक्युलर पत्रकार’

  • hindiadmin
  • September 11, 2017
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एक महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या होती है और हत्या के तुरंत बाद काफी समय से घोर निंद्रा में सो रहे इन पत्रकारों को जैसे संजीवनी बूटी मिल गई हो, फिर इनका वहीं पुराना विरोध का चलन ट्विटर से लेकर सड़कों पर दिखाई देने लगा. बिना किसी जांच, गवाह या साक्ष्य के सीधे केंद्र सरकार को इस हत्या के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है. लेफ्ट विचारधारा वाले पत्रकारों के इस धड़े ने जांच शुरू होने तक का भी इंतजार करना जरुरी नहीं समझा. इससे साफ है कि इनका ना तो भारतीय न्याय प्रणाली में विश्वास है और न ही भारतीय संविधान में. यही नक्सली मानसिकता है. लेफ्ट विचारधारा वाले पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर माननीय प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां की और ट्विटर पर #BlockNarendraModi कैंपेन चलाया गया. हालांकि इसका विपरित असर हुआ और प्रधानमंत्री मोदी के ट्विटर फॉलोअर्स की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई. लेकिन यह पूरा प्रकरण किसी भी लोकतंत्र के लिए न सिर्फ खतरा है, बल्कि उनकी यह करतूत देश को शर्मसार करती है.

तथाकथित सेक्युलरिस्ट नेता और पत्रकार प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने के लिए सकारात्मक बहस की बजाय विवादित बयानों और गाली-गलौच की भाषा पर उतर आये हैं. इसमें कांग्रेस सरकार के कई वरिष्ठ नेता और स्वयं को सेक्युलर कहलाने वाले वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं. हमेशा से विवादों में रहने वाले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के नाम इसमें शामिल हैं. अगर ये तथाकथित सेक्युलरिस्ट नेता और पत्रकार इसी तरह अपना स्तर गिराते रहे तो राजनीति और मीडिया की रही सही विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ जाएगी.

हमारी ये रिपोर्ट गौरी लंकेश की मौत पर मोदी सरकार को कटघरे में खड़े करने वाले इन पत्रकारों के चेहरे से नकाब उतार देगी, कि कैसे ये पत्रकार राजनीतिक दल के एजेंट के तौर पर काम कर रहे है और सरकार के खिलाफ जब भी मौका मिलता है तो एजेंडा चलाने से बाज नहीं आते है.

आज हम आपको ऐसे ही कुछ पत्रकारों की लिस्ट दिखाएंगे जिन्होंने २०१३ से अब तक मारे गए २१ पत्रकारों की मौत पर कोई आवाज नहीं उठाई. एक नजर आप भी डाल लीजिए.

देखा आपने गौरी लंकेश पर मगरमच्छी आंसू बहाने वाले इन पत्रकारों का सच जो ये इनकी मंशा पर सवाल खड़ा करता है. और ये दिखाता है किस तरह से किसी की मौत पर अपने राजनीतिक आकाओं की रोटियां सेंकने से भी ये बाज नहीं आते.

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