कहानी उस वीर की जिसने २३ साल की उम्र में मौत को माना “महबूबा” – दि फिअरलेस इंडियन
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कहानी उस वीर की जिसने २३ साल की उम्र में मौत को माना “महबूबा”

  • hindiadmin
  • September 28, 2017
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भगत सिंह का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है. भगत सिंह का नाम आते ही आंखो के सामने उस शख्स की तस्वीर उभर कर आ जाती है जिसने छोटी सी उम्र में देश की आजादी के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी. जिस उम्र में हम और आप मोबाइल, बाईक या फिर लैपटॉप के लिए जिद्द करते है, उसी उम्र में उन्होने देश को अंग्रेजो से आजाद कराने की जिद्द ठान ली. भगत सिंह के जीवन में क्रांती शब्द का मतलब कुछ इस तरह है जैसे आदमी और उसकी परछाई.

महान क्रांतिकारी, क्रांतिदूत, शहीदे-आजम ऐसे कुछ शब्द है जो भगत सिंह के नाम के आगे जोड़े जाते है. 28 सितंबर को भगतसिंह की 110वीं जयंती. भगत सिंह को युवाओं में आदर्श माना जाता है, वैसे तो देश के सभी लोग उनकी शहादत को सलाम करते है, लेकिन देश के युवा भगत सिंह का नाम आने पर ही अपनी छाती चौड़ी कर लेते है. भगत सिंह ने 23 साल की छोटी सी उम्र में इंकलाब का नारा बुलंद करते हुए ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर दिया था, ये वही उम्र है जहां आज का ज्यादातर युवा अपने करियर और अपने प्रेमी प्रेमिकाओं के बारे में सोचता है, लेकिन भगत सिंह की बात ही कुछ और थी, इस उम्र में उन्होने सोचा तो सिर्फ अपने देश और देशवासियों के प्रति, उनकी आजादी के बारे में.

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को एक जाट सिख परिवार में ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले में बंगा गांव में किशन सिंह और विद्यावती के घर में हुआ था. क्रांती तो उन्हे जैसे विरासत में मिली थी. उनके जन्म के समय उनके पिता और दो चाचा, अजित सिंह और स्वर्ण सिंह जेल में थे, जिनको आजाद करने की बात चल रही थी, इन सभी बातों को भगत सिंह बड़े ध्यान से सुनते थे. जैसे जैसे भगत सिंह की उम्र बढ़ती गई, भगत सिंह के अंदर देश को आजाद करने और अंग्रेजो को देश से बाहर निकालने की भावना और भी तीव्र होने लगी.

जिस समय जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ था, उस समय भगत सिंह की उम्र सिर्फ 12 साल थी. इस कांड की खबर मिलते है भगत सिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए थे. 13 साल की उम्र से ही उन्होने क्रांतीकारियों के समुहों में जुड़ना शुरु कर दिया था.

जानकर हैरानी होगी कि परिजनों ने जब भगत सिंह की शादी करनी चाही तो वह घर छोड़कर कानपुर भाग गए. अपने पीछे जो खत छोड़ गए, उसमें उन्‍होंने लिखा कि उन्‍होंने अपना जीवन देश को आजाद कराने के महान काम के लिए समर्पित कर दिया है. इसलिए कोई इच्‍छा या ऐशो-आराम उनको अब आकर्षित नहीं कर सकता.

ऐसे में शहीद-ए-आजम की शादी हुई पर कैसे हुई इसके बारे में बताते हुए भगत सिंह की शहादत के बाद उनके घनिष्ठ मित्र भगवती चरण वोहरा की धर्मपत्नी दुर्गा भाभी ने, जो स्वयं एक क्रांतिकारी वीरांगना थीं, कहा था, “फांसी का तख्ता उसका मंडप बना, फांसी का फंदा उसकी वरमाला और मौत उसकी दुल्हन.”

एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भगत सिंह का योगदान भी अपने आप में अद्भुत है. 8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तार होने से पूर्व उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की प्रत्येक गतिविधि में बढ़-चढ़ कर भाग लिया. 1920 में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, उस समय भगत सिंह मात्र 13 वर्ष के थे और 1929 में जब गिरफ्तार हुए तो 22 वर्ष के थे. इन 9 वर्षों में उनकी एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गतिविधियां किसी भी देशभक्त से कम नहीं हैं.

लाहौर षड़यंत्र केस में उनको राजगुरू और सुखदेव के साथ फांसी की सजा सुनाई और 24 मई 1931 को फांसी देने की तारीख नियत हुई थी. लेकिन नियत तारीख से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को उनको शाम साढ़े सात बजे फांसी दे दी गई, जो कि नाजायज तौर पर दी गई थी. उनके नाम एफआईआर में थे ही नहीं. झूठ को सच बनाने के लिए पाक सरकार ने 451 लोगों से झूठी गवाही दिलवाई.

दी फीयरलेस इंडियन ऐसे वीर क्रांतिकारी भगत सिंह को उनके 110वीं जयंती पर शत शत नमन करता है!

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