तो भगत सिंग,सुखदेव,लोकमान्य तिलक जैसे स्वतंत्र सेनानिओं ने किया क्या..? – दि फिअरलेस इंडियन
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तो भगत सिंग,सुखदेव,लोकमान्य तिलक जैसे स्वतंत्र सेनानिओं ने किया क्या..?

  • Shyam kadav
  • August 9, 2017
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भारत छोडो आंदोलन द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ८ अगस्त १९४२ को आरम्भ किया गया था. यह एक ऐसा आन्दोलन था जिसका लक्ष्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करना था. यह आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुम्बई अधिवेशन में शुरू किया गया था. यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विश्वविख्यात काकोरी काण्ड के ठीक सत्रह साल बाद ९ अगस्त सन १९४२ को गांधीजी के आवाहन पर समूचे देश में एक साथ आरम्भ हुआ. यह भारत को तुरन्त आजाद करने के लिये अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एक सविनय अवज्ञा आन्दोलन था.

क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला लिया. ८ अगस्त १९४२ की शाम को मुंबई में अखिल भारतीय काँगेस कमेटी के मुंबई सत्र में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नाम दिया गया था. हालांकि गाँधी जी को फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया गया था लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फ़ोड़ की कार्रवाइयों के जरिए आंदोलन चलाते रहे. इस आंदोलन के के बाद १५ अगस्त १९४७ को भारत को आझादी मिली. और भारत की आझादी का मसीहा महात्मा गाँधी को बनाया गया. लेकिन एक सवाल सबके मन में उठता है, वो यह है की अगर गांधीजी के १९४२ के भारत छोडो आंदोलन से देश को आझादी मिली तो १९४२ के पहले जिन स्वतंत्र सेनानिओं ने इस देश के लिए अपनी जान निछावर कर ली उन स्वतंत्र सेनानिओं आखिर क्या किया..?

देश के लिए अपनी जान की परवाह ना करने वाले उन शहीद भगतसिंग,सुखदेव,राजगुरु ने देश के लिए दिया हुआ बलिदान कुछ भी नहीं है क्या..? हसते हसते फांसी पे जाकर देश के आझादी में महत्पूर्ण योगदान देनेवाले कई सारे देशभक्तों ने इस देश के लिए कुछ भी नहीं किया है क्या? ऐसे कई सारे सवाल हर किसी के मन में उपस्थित होते है. क्यों की भारत के स्वतंत्रता से हर बात पर मोहनदास गाँधी को देश मसीहा दर्शाया गया. हलाकि उस वक्त की कांग्रेसी राजनीती इसमे पूरी तरह से झलक रही थी.

इसी दौर में अपने जहाल विचारधारा के साथ आझादी की जंग में उतरेवाले लोकमान्य तिलक ने स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे में पाकर ही रहूँगा यह नारा देकर देश के आझादी के लिए कही आंदोलन किये और इसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा लेकिन आझादी की जंग वह आखिरी दम तक वह लढते रहे. जब उनकी मृत्यु हुई तब उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए गांधीजी ने उन्हों आधुनिक भारत का निर्माता और नेहरू ने उन्हें भारतीय क्रांति का जनक बताया. फिर भी भारत छोडो ही देश के आझादी का आंदोलन कैसे बन सकता है?

क्या हम भूल गए स्वातंत्रवीर सावरकर को, जिन्हें इस देश की आझादी के लिये अंदमान में जेल काटनी पड़ी. हम कैसे भूल सकते है शहीद खुदीराम बोस को जो घूमने-खेलने उम्र में फंसी पर चले गए. लाला लाजपत राय,रानी लक्ष्मीबाई,बासुदेव बलवंत फडके,सुभाषचंद्र बोस,स्वामी विवेकानंद,गोपाल कृष्ण गोखले ऐसे कई सारे स्वतंत्र सेनानी है जिन्होंने देश के आझादी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. फिर भारत छोडो ही देश की आझादी का मूलमंत्र कैसे….?

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