बचपन पर हावी तनाव और बोझ – दि फिअरलेस इंडियन
Home / विचार / बचपन पर हावी तनाव और बोझ

बचपन पर हावी तनाव और बोझ

  • hindiadmin
  • April 24, 2017
Follow us on

इन तीन घटनाओं को पढ़िए :
पहली : कोटा में कोचिंग में पढ़ाई कर रहा छात्र अपने पिता को लिखता है-माफ करना पापा, हम आपके सपने को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. अपने भाई को सलाह देता है कि वह खूब पढ़ाई कर मां-पापा के सपने को साकार करे. इसके बाद वह कूद कर जान दे देता है.

दूसरी : दिल्ली में दो भाई कमरे बंद कर मोबाइल पर गेम खेलते-खेलते इतने डिप्रेस्ड हो गये कि उन्हें कुछ पता ही नहीं चला. न खाना खाया, न पानी पिया. पैंट में ही पेशाब होता रहा, लेकिन उन्हें इसका आभास तक नहीं हुआ.

तीसरी : रांची में दस साल के एक छात्र ने राज्य के मुख्यमंत्री के नाम संदेश लिखा- मां कहती है खेलों. हम कहां खेलें, खेल का मैदान कहां बचा है? आप जहां (जमशेदपुर में) रहते थे, खेलते थे, वहां मैदान था. हम रोड पर खेलते हैं, तो गाड़ी और घरों का शीशा टूटता है, मार पड़ती है. हम कैसे खिलाड़ी बनेंगे. खेल के मैदानों पर कब्जा कर लिया है. बताइए, हम सब क्या करें?

ये तीनों घटनाएं समाज को बेचैन करनेवाली हैं. घटनाएं सच हैं. बच्चे तनाव में हैं. उनका बचपन खत्म हो गया है. ये बताती हैं कि हालात कितने बिगड़ चुके हैं.  हर मां-बाप अपने बच्चों को इंजीनियर (वह भी आइआइटी से ही) इंजीनियर बनाना चाहता है, डॉक्टर बनाना चाहता है.

माता-पिता बच्चों पर दबाव बनाते हैं. बच्चे क्या बनना चाहते हैं, कोई नहीं पूछता. अपनी इच्छा उन पर लाद देते हैं. यह नहीं देखते कि बच्चे में कूवत है या नहीं, इच्छा है या नहीं. जबरन डाल देते हैं कोचिंग में. नतीजा एक-दो बार प्रयास के बाद वह निराश हो कर यह समझ लेता है कि सब कुछ खत्म हो गया है और जान दे देता है. रोज ऐसी घटनाएं घट रही हैं. आंकड़े बताते हैं कि देश में हर घंटे एक छात्र जान दे रहा है. उनमें धैर्य नहीं है. अधिकांश माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पाते, दोनों नौकरी करते हैं, आया (दाई) के भरोसे बच्चों  को  छोड़ जाती हैं और यह उम्मीद करते हैं कि बच्चा आइआइटी करे. आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं, उन्हें इलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास ले जाया जा रहा है. सिर्फ मेडिकल-इंजीनियरिंग की बात नहीं है. छोटी कक्षाओं में या १०वीं, १२वीं की परीक्षा में असफल होने के बाद बच्चे जान दे रहे हैं. इन बच्चों को बचाना हम सभी का दायित्व है.

ऐसी बात नहीं है कि एक परीक्षा में फेल होने के बाद सब कुछ खत्म हो जाता है या सिर्फ आइआइटी करने से ही भविष्य बन सकता है. देश के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम ने तो आइआइटी से पास नहीं किया था, रसायन में  नोबल प्राइज विजेता वेंकटरमण राधाकृष्णन ने भी आइआइटी की परीक्षा पास नहीं की थी, जेइइ में फेल होने के बाद सत्या नडेला ने हिम्मत नहीं हारी थी और माइक्रोसॉफ्ट के सीइओ बने थे.

कल्पना चावला पर देश को गर्व है, लेकिन कल्पना आइआइटी की परीक्षा पास नहीं कर सकी थी, लेकिन उन्होंने इतिहास रचा था. सोचिए, अगर ये सभी आइआइटी नहीं करने से निराश हाे कर घर में बैठ जाते, डिप्रेशन में चले जाते ताे क्या इतिहास रच पाते? नहीं रच पाते. बिल गेट्स हावर्ड के ड्राप आउट हैं. पहले बिजनेस में असफल रहे. बाद में दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बने. आइंस्टीन चार साल क बाेल नहीं पाते थे, सात साल तक लिख नहीं पाते थे, स्कूल से निकाल दिया गया था.  थॉमस एडिशन काे शिक्षक ने स्टुपिड बताते हुए कहा था-यह लड़का कुछ नहीं कर सकता. उसी एडिशन ने बल्ब का आविष्कार किया. दाे बार इंग्लैंड के प्रधानमंत्री रहे चर्चिल भी छठे ग्रेड में फेल कर गये थे. ये बाद में सफल हुए आैर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया. निराश हाेकर जान देना, डिप्रेशन में जाना किसी समस्या का समाधान नहीं हैं.

दरअसल बच्चें करें ताे क्या करें, किससे बात करें, काेई उनकी सुनता नहीं. घर में माता-पिता नहीं सुनते. दाेनाें कमाने में लगे रहते हैं. बच्चे की हर जिद काे पूरा करते हैं. बाइक मांगता है, बाइक देते हैं. माेबाइल मांगता है, माेबाइल देते हैं. काेचिंग भेज कर अपनी जिम्मेवारी से मुक्ति पा लेते हैं. सच ताे यह है कि संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहा है.

दादा-दादी का प्यार मिल नहीं पाता. अच्छे आैर बुरे में फर्क काेई बता नहीं पाता. स्कूल के शिक्षक काम से काम रखते हैं. कुछ कानून ने उनके हाथ काे बांध रखा है.  बच्चाें के लिए  खेल का मैदान नहीं है.  बाहर खेलने नहीं सकते. ऐसे में माेबाइल आैर टीवी उनका सहारा है. इसमें घंटाें डूबे रहते हैं आैर यही उनके जीवन काे खराब कर रहा है. याद कीजिए आज से २०-२५ साल पहले ये हालात नहीं थे. स्कूली बच्चाें पर तनाव नहीं था. बच्चे स्कूल से आ कर बैग पटक कर खेलने के लिए निकल जाते. खेलते भी, लड़ते-झगड़ते भी थे, तनाव वहीं निकल जाता था. बच्चे शारीरिक आैर मानसिक ताैर पर मजबूत हाेते थे. हर समस्या से जूझते थे. हार नहीं मानते थे. यही कारण था कि उन दिनाें आत्महत्या की घटनाएं बहुत कम घटती थीं.

चिंतन का विषय : बचपन पर हावी तनाव और बोझ

अब समय आ गया है, माता-पिता, शिक्षक सभी बच्चाें की स्थिति काे समझे. उन पर उतना ही भार लादें, जितना वे सह सकते हैं. सुबह पांच बजे उठ कर अगर काेई बच्चा पहले स्कूल, फिर हाेमवर्क, उसके बाद ट्यूशन में लगा रहेगा, ताे वह खेलेगा कब? पढ़ाई आवश्यक है लेकिन इसके साथ खेल आैर मनाेरंजन भी उसके विकास के लिए आवश्यक है.

इन बच्चाें के बचपन काे बचाना हाेगा. उनके मन में क्या चल रहा है, उनकी बाताें काे सुनना हाेगा, उनके तर्क आैर उनकी परेशानियाें काे समझना हाेगा. उनकी क्षमता की पहचान करनी हाेगी. जबरन थाेपने से किसी का भला नहीं हाेनेवाला. हम यही सब कुछ समाज काे बताने का प्रयास कर रहे. यह एक गंभीर अभियान है, जिसका उद्देश्य बच्चाें काे बचाना, उनके अंदर पनप रही नकारात्मक भावनाआें काे दूर करने में मदद करना है. अभिभावक काे यह सचेत करना है कि आप एक अनावश्यक दबाव बच्चाें के जीवन काे खतरे में डाल सकता है. बच्चाें काे समय दीजिए,उनसे बात कीजिए, पॉजिटिव आैर प्रेरक कहानियां सुनाइए, ताकि वे जीवन के इस संघर्ष का मजबूती से सामना कर सकें.

Comments

You may also like

बचपन पर हावी तनाव और बोझ
Loading...