पाक लेखक ने उठाए सवाल, पाकिस्तानी इतिहास से चाणक्य का नाम क्यों है गायब? – दि फिअरलेस इंडियन
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पाक लेखक ने उठाए सवाल, पाकिस्तानी इतिहास से चाणक्य का नाम क्यों है गायब?

  • hindiadmin
  • August 2, 2017
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महान दार्शनिक चाणक्य उर्फ कौटिल्य को पाकिस्तान के इतिहास में तवज्जो नहीं दी गई है. ऐसा तब है जब तक्षशिला पाकिस्तान की सरजमीं का ही हिस्सा रहा है. अब एक पाकिस्तानी लेखक ने इसपर सवाल उठाया है. पेशे से रिसर्चर और फोटोग्राफी का जुनून रखने वाले लेखक सैफ ताहिर ने ये सवाल उठाया है. लेखक बाहरिया यूनिवर्सिटी और नेवी वार कॉलेज की पूर्व फैकल्टी और ट्रेनर हैं.

ताहिर ने पाकिस्तानी न्यूज वेबसाइट डॉन में छपे लेख में सवाल उठाया है कि अगर चाणक्य का पाकिस्तान से इतना गहरा जुड़ाव है तो भला उन्हें यहां के इतिहास में क्यों नहीं शामिल किया गया है. सैफ ताहिर ने अपनी एक यात्रा का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा, ‘पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में जब बेतहाशा गर्मी पड़ती है तो लोग हरिपुर स्थित खानपुर झील के पास राहत के लिए आते हैं. यहां जाते हुए रास्ते में खानपुर मार्ग पर तक्षशिला दिखाई पड़ता है, यहां लगे साइनबोर्ड पर लिखा है, ‘मोहरा मुरादु अवशेष’. यह रास्ता काफी घुमावदार है, लेकिन काफी खूबसूरत है. इसी सड़क पर आगे बढ़ेंगे तो आपको एक छोटा गांव मिलता है, जहां प्रकृति का असली रंग देखने को मिलता है. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के मस्जिद के अवशेष को ‘मोहरा मुरादु’ कहते हैं. वे कहते हैं मोहरा मुरादु तक्षशिला के १८ मठों में से एक का अवशेष है. वही तक्षशिला जो उस दौर में दुनिया भर के लोगों के लिए शिक्षा ग्रहण करने का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था.

The Dharmarajika monastery's remains. - Photo: Saif Tahir

मोहरा मुरादु, जोलियां, धर्मराजिका, सिरकप और पिप्पलन के साथ बने १८ मठों में से एक था. ये दुनिया की पहली ज्ञात यूनिवर्सिटी थी और शैक्षणिक अध्ययन का केंद्र था. लेखक ने कहा, ‘उस वक्त तक यूनिवर्सिटी शब्द की उत्पत्ति ही नहीं हुई थी लेकिन ७०० वर्ष ईसा पूर्व में बना तक्षशिला, काफी हद तक यूनिवर्सिटी की तरह ही कार्य करता था.’ बता दें कि तक्षशिला विश्वविद्यालय वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी से १८ मील उत्तर की ओर स्थित था. जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि भगवान राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी.

A board reading the history of the Mohra Muradu monastery. - Photo: Saif Tahir

तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के १०,५०० से अधिक छात्र अध्ययन करते थे. यहां ६० से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था. प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की. तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था. आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी. शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे. परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी. चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छरू माह का शोध कार्य करना पड़ता था. इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी.

The remains of the Sirkap monastery. - Photo: Saif Tahir

बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथ, जताकस में तक्षशिला को सदियों पुराने अध्ययन केंद्र के रूप में उद्धत किया गया है. ऐसा कहा जाता है कि यहीं पर पहली बार महाभारत का वर्णन किया गया था. पूर्वी-पश्चिम क्षेत्र जो आज पाकिस्तान है वहां गंधारा साम्राज्य के उदय का तक्षशिला के विकास पर खासा प्रभाव रहा है. यूनिवर्सिटी में वेद, एस्ट्रोनॉमी, फिलॉसफी, सर्जरी, राजनीतिक, वाणिज्य, संगीत, तीरंदाजी सहित कई विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी. अन्य बौद्ध ग्रंथों के मुताबिक, तक्षशिला में दाखिले के लिए छात्र सुदूर प्रदेशों से आते थे. एक मशहूर दक्षिण एशियाई सूक्ति है- ‘जो गुर से मरे, उसे जहर क्यों दो.’ यह कथन राजा मौर्य और चाणक्य के बीच ३३० वर्ष ईसा पूर्व हुई बातचीत का हिस्सा है.

४०५ ई में यहां आए चीनी यात्री फाह्यान के हवाले से कहा गया है कि इस विश्वविद्यालय का जुड़ाव हिन्दुओं के अलावा बौद्ध से भी रहा है. बौद्ध ग्रंथों के हवाले से दावा किया गया है कि रावलपिंडी जिले से लगभग ३२ किमी उत्तर-पूर्व में स्थित तक्षशिला विश्‍वविद्यालय में चाणक्य ने अर्थशास्‍त्र और राजनीति शास्‍त्र की शिक्षा पाई थी. देश बंटवारे के बाद तक्षशिला पाकिस्तान में चला गया, जिसके बाद वहां के इतिहास में इसे तवज्जो नहीं दी गई. उन्होंने लिखा है कि चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का सम्राट बनाया था, जिसके बाद मौर्य साम्राज्य ने अपनी राजधानी तक्षशिला को ही बनाई थी. महान दार्शनिक चाणक्य ऊर्फ कौटिल्य/विष्णु गुप्त का इस हद तक तक्षशिला से जुड़ाव होने के बावजूद पाकिस्तान के इतिहास में उन्हें खास तवज्जो नहीं मिलने पर सवाल उठाया है.

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